आज़ादी
माना अब आज़ाद हैं हम, आज़ादी हमको प्यारी है,
जल, थल और आकाश में उड़ने की अभिलाषा न्यारी है।
सुन्दर घर है हम सब का, चाहे कुटिया, महल, अटारी है,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर पर श्रद्धा सबकी सारी है।
लेकिन फिर भी कोई मनचला ठेस हमें पहुंचाता है,
प्रेम और विश्वास के आँगन में हड़कंप मचाता है।
विचलित होकर धैर्य सिहरता, जग जाता मन में अज्ञान,
अगले पल सुमिरन हो आता "स्वत्व, आस्था और स्वाभिमान।"
दिल में जागृत हो जाती है मानवता की शाश्वत रीत,,
कैसे भूलें हदों की रक्षा, जब हम बाँटें घर-घर में प्रीत।
अपनी फुलवारी को काँटों के ज़ख्मों से बचाना है,
निर्बल को दे अभय-दान, निज घर को स्वर्ग बनाना है।
याद रखो है नींव देश की आदर, श्रद्धा और सम्मान,
चार-दीवारी है निष्ठा की, आस्था का है यह निर्माण।
बल-पौरुष, शिक्षा की छत से रखें सुरक्षित घर परिवार,
हिल-मिल कर जीने-मरने का कायम रहे सुहृद व्यवहार।
सुखी और संपन्न हो जन-जन, सफर नहीं है यह आसान,
नमन हमारा उनको जो तन, मन, धन का करते बलिदान।।
शारदा लाल (२६-०२-२००७)
माना अब आज़ाद हैं हम, आज़ादी हमको प्यारी है,
जल, थल और आकाश में उड़ने की अभिलाषा न्यारी है।
सुन्दर घर है हम सब का, चाहे कुटिया, महल, अटारी है,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर पर श्रद्धा सबकी सारी है।
लेकिन फिर भी कोई मनचला ठेस हमें पहुंचाता है,
प्रेम और विश्वास के आँगन में हड़कंप मचाता है।
विचलित होकर धैर्य सिहरता, जग जाता मन में अज्ञान,
अगले पल सुमिरन हो आता "स्वत्व, आस्था और स्वाभिमान।"
दिल में जागृत हो जाती है मानवता की शाश्वत रीत,,
कैसे भूलें हदों की रक्षा, जब हम बाँटें घर-घर में प्रीत।
अपनी फुलवारी को काँटों के ज़ख्मों से बचाना है,
निर्बल को दे अभय-दान, निज घर को स्वर्ग बनाना है।
याद रखो है नींव देश की आदर, श्रद्धा और सम्मान,
चार-दीवारी है निष्ठा की, आस्था का है यह निर्माण।
बल-पौरुष, शिक्षा की छत से रखें सुरक्षित घर परिवार,
हिल-मिल कर जीने-मरने का कायम रहे सुहृद व्यवहार।
सुखी और संपन्न हो जन-जन, सफर नहीं है यह आसान,
नमन हमारा उनको जो तन, मन, धन का करते बलिदान।।
शारदा लाल (२६-०२-२००७)