उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
संसार से ऋण मुक्त हो कर मै, ..........
नयनों के सागर को देखूंगा, ........
न जानोगी मैं कितना हार्दिक कृतकृत्य हूँगा!!
सर्प सी लिपटी जटाएं
जब गगन को ढांप लेंगी।
सर्प सी लिपटी जटाएं जब गगन को ढांप लेंगी ,
बादलों की उस निराली चाल पर मैं मुग्ध हूँगा।।.....
जिनके पर्दे से छिटकती ...
चांदनी विश्राम देगी।
जिनके पर्दे से छिटकती चांदनी विश्राम देगी,
वर्षों से प्यासे पथिक को सौम्यता का पान देगी।।
आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ ,
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।।
कुछ क्षणों में आ रही
आंधी का अब आभास भी है,
कुछ क्षणों में आ रही आंधी का अब आभास भी है,
जो उड़ा लेगी लटें और शांत मुख होगा प्रदर्शित।।
फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे,
कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?
फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे, कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?,
मैं उसकी गोद में ऋण मुक्त होकर, एक नया संसार देखूंगा।।
न जानोगी वही पल..
जन्म-जन्मों के सबर का....
न जानोगी वही पल, जन्म-जन्मों के सबर का,
धैर्य का, संतोष का, संघर्ष का उत्सर्ग होगा।।
आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ।
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।।
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
संसार से ऋण मुक्त हो कर मै, ..........
नयनों के सागर को देखूंगा, ........
न जानोगी मैं कितना हार्दिक कृतकृत्य हूँगा!!
सर्प सी लिपटी जटाएं
जब गगन को ढांप लेंगी।
सर्प सी लिपटी जटाएं जब गगन को ढांप लेंगी ,
बादलों की उस निराली चाल पर मैं मुग्ध हूँगा।।.....
जिनके पर्दे से छिटकती ...
चांदनी विश्राम देगी।
जिनके पर्दे से छिटकती चांदनी विश्राम देगी,
वर्षों से प्यासे पथिक को सौम्यता का पान देगी।।
आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ ,
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।।
कुछ क्षणों में आ रही
आंधी का अब आभास भी है,
कुछ क्षणों में आ रही आंधी का अब आभास भी है,
जो उड़ा लेगी लटें और शांत मुख होगा प्रदर्शित।।
फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे,
कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?
फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे, कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?,
मैं उसकी गोद में ऋण मुक्त होकर, एक नया संसार देखूंगा।।
न जानोगी वही पल..
जन्म-जन्मों के सबर का....
न जानोगी वही पल, जन्म-जन्मों के सबर का,
धैर्य का, संतोष का, संघर्ष का उत्सर्ग होगा।।
आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ।
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।।
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।
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