स्वच्छता अभियान -
स्वच्छ भारत का निर्माण
यह चाहते तो हैं सभी माहौल अच्छा चाहिये।
हर गाऊँ अच्छा चाहिये, हर शहर अच्छा चाहिये।।
सुंदर गली बाज़ार हो , सुंदर नदी तालाब हो.
सुंदर गगन , सुंदर धरा , सुंदर प्रभा का ख़्वाब हो ।।
है मगर कुछ और भी जो सब जनो में चाहिये।
न चाह केवल स्वच्छता की हो , प्रयत्न भी चाहिये।।
हैं जो यह सब जानते , उनसे मेरी यह अर्ज़ है।
अपने घरों की छत के नीचे देखें कैसी फ़र्श है।।
साफ़ आँगन है हमारा , साफ़ पिछवाड़ा है क्या।
घर के चारों ओर रहता पेड़ों का पहरा है क्या।।
है अगर दामन हमारा मैल से लिपटा नहीं।
मन हमारा द्वैष के दुर्भाव से जकड़ा नहीं।।
फिर कहाँ रोकेगा कोई हमको बढ़ने से कभी।
स्वच्छ पर्यावरण के हित चल पड़ें आगे सभी।।
संकल्प लें हर वर्ष हम दो - चार पौधे रोप दें।
जंगलों की दुर्दशा जो हो रही वह रोक दें।।
फूल - फल के पेड़ रोपें वृक्ष छायादार हों।
दो तरफ सड़कों के जैसे सब्ज़ पहरेदार हों।।
लहलहाते खेत हों और झूमती सी ब्यार हो।
स्वच्छ पर्यावरण में रमणीक घर तैयार हों।।
पेड़ पोधों की हिफ़ाज़त से हमारा प्यार हो।
उस प्रभु की भेंट को पाने के हम हक़दार हों।।
मैल और कचरे की शुद्धी की नई तकनीक हो।
शीघ्र ही अब स्वच्छ भारत की नई तामीर हो।।
कुछ सीखो
केले के छिलके को भैया रस्ते में न फेंको,
इस पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो।
वहां के सारे लोग हंसेंगे, उसको देंगे ताना ,
“चलने की जो शिक्षा चाहिए, तुम
फौजी बन जाना।“
बेचारा तो उठ न सकेगा, कहेगी पीड़ा "चीखो"
लोग वहाँ पर यही कहेंगे "चलना तो
भैया सीखो"
मुँह पीला कर के हँस देगा, उठेगा लाज के मारे,
कहेगा "तुम सब सच्चे हो, हैं सारे दोष
हमारे"।
खून का घूँट पियेगा मन में, भावुक हो रोने को,
नहीं सहारा देगा फिर भी उसे खड़ा होने को।
स्वयं पूछ लो ह्रदय से अपने, रहा है क्या कहने को,
मेरी तरह ही कहोगे तुम भी सभी से यह कहने को,
केले के छिलके को भैया रस्ते में न फेंको,
इस पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो"।
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