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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

मन पक्षी

मन पक्षी
जब से नीड़ के बाहर मैने पाँव रखा है,
पंखों को सपनों की बस्ती में दर -दर उड़ता पाया है। 
 चिर परिचित दिल की गर्मी का अनुभव पाने को ,
पक्षी घर से दूर चला है ,
दूर चला है। 
 
पानी की गिरती बूंदों की पार की दुनिया
मुझे भाई। 
यह क्षण -भंगुर सतरंगी भी
रिझा पाई। 
माटी की खुशबू  में लिपटी
मूरत मुझको रास  आई। 
सपनो से मन ऊब चुका है,
ऊब चुका है।
पक्षी घर से दूर चला है,
दूर चला है।  
 
खुशियों की सौगात
धुली है बरसातों में। 
होली आकर बीत गई है
सन्नाटों  में। 
दिवाली की रौनक,
नवरात्रों की पूजा,
नए वर्ष की खातिर ,
प्राणी भूल गया है। 
पक्षी घर से दूर चला है,
दूर चला है। 
 
आज है तुमसे
हे मन -पक्षी,
यही याचना। 
"उड़ने की पूरी ताकत दे ",
यही प्रार्थना। 
"सृष्टि  में जो विविधि ऋचाएँ
खूब गढी  है ,
अनुभूति -
संतोष सहित उनको पाने की
विधा बता दे,
पता बता दे,
दिशा बता दे। 
 
पक्षी घर से दूर चला है, दूर चला है। 
पक्षी घर से दूर चला है , दूर चला है। 
                                                                     (30-10-2006)

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

आनंद करो और राज्य करो

हम स्वस्थ बनें और श्रेष्ठ बनें ,
आदर्श बनें दुनिया के लिए।
आओ सब मिल संकल्प करें
कुछ त्याग करें दुनिया के लिए।

उत्तम है सबसे त्याग समय का
दींन -दुखी जनता के लिए,
हम खैर-ख़बर उनकी पूछें
कुछ वक़्त निकालें उनके लिए ।.

रोग ग्रस्त जो प्राणी हैं
निर्धन, बे-घर, अज्ञानी हैं,
आओ हम उनकी मदद करें
सम्भाव दिलों में उदीप्त करें।।

यह जीवन दर्द भरा है बहुत
इसमें सुख की इच्छा है प्रबल,
आओ सुख के पल-छिन  बाँटें
सम-भ्रात्र भाव से आगे बढ़ें।।

ये दया के सागर मंदिर-मस्जिद,
गुरूद्वारे और गिरीजाघर ,
अर्पित कर दें अपने संसाधन
संताप से जग को मुक्त करें।।

प्रभु ने बहुत दिया है हमें
हम दान करें निज सुख के लिए।
संतोष की धारा पीने को
हम प्रेम की गंगा बहाते रहें।।

बच्चो, तुम कल के शासक हो
संसार के भाग्य-विधाता हो।
संकल्प करो, नेकी पर चल कर---

( न्याय की खुली व्यवस्था में---)

आनंद करो और राज्य करो,
आनंद करो और राज्य करो।।
                          (15 अगस्त 2011)







रक्षा करो 

रक्षा करो, रक्षा करो।
रक्षा करो, रक्षा करो।
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

बख्शो मुझे, बख्शो मुझे।
बख्शो मुझे, बख्शो मुझे।
बख्शो दुर्व्यस्नों से बख्शो मुझे।

मेरा ह्रदय है अस्थिर बहुत,
न जाने कहाँ जाए दृष्टि बिखर।
मुझे डाल दो साधना की डगर।
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो;
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

स्वाधीन हो मेरे मन का भ्रमर,
कभी  घुट के तड़पे न परबस बन कर।
हनुमान भेजो, जला दो नगर,
गिरा दो ये ऊँचे अहम् के शिखर।
सिया-राम भक्ति का वरदान दो,
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो,
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

यह जीवन न जाने कहाँ से चला,
न जाने कहाँ तक चला जाएगा।
मिले राह में कौन, बिछ्डेगा कौन,
कहाँ शब्द उभरेंगे, कब होगा मौन।
वरद हस्त से मेरी रक्षा करो,
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो,
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।
                                (20-10-2011)