देश ने २६ जनवरी, २०२०, रविवार के दिन भारत का ७१वां गणतंत्र दिवस मनाया। शिशिर ऋतु की खुली मनमोहक धूप और तन को आनंदित करने वाली तपिश ने लगभग सभी को घर से बाहिर निकलने के लिए प्रेरित किया। बाहिर निकलने वालों में एक बार फिर सब से आगे-आगे थे जवान और किसान।
वैसे तो शायद ही कोई दिन होगा जब जवान और किसान घरों में बैठते हों। वे जानते हैं कि यदि वे घर में बैठे रहें तो सीमाओं पर घुसपैठ और सड़कों पर अराजकता कौन रोकेगा, मातृभूमि की संतान को अन्न उपलब्ध कौन कराएगा, कल-कारखानों के लिए कच्चा माल और न केवल मानव जाति अपितु पशु धन के लिए भी आहार कौन उपलब्ध कराएगा ! परन्तु आज वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर पिछले कुछ माह की सर्दी, वर्षा और हिमपात के उपरान्त सुखद मौसम का आनंद लेने के साथ-साथ अपने कर्तव्य को निभाने सीमाओं और खेतों में डट गए थे।
यह देश का गणतंत्र ही है जो सभी नागरिकों को सुखी एवं सम्मानित जीवन जीने के अधिकार देता है। यह गणतंत्र सरकार पर न्याय एवं विधान का सम्मान करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा निश्चित करने का दायित्व भी सौंपता है। यही गणतंत्र है जो प्रत्येक नागरिक पर देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को भी निश्चित करता है। यदि देश के नागरिक जिम्मेदारियें न निभाएं तो वे सुरक्षित कैसे रह पाएंगे। अराजकता किसी को लाभ नहीं सकती।
इस गणतंत्र की रक्षा के लिए असंख्य बाल, नवयुवक, वृद्ध स्त्री-पुरुषों ने स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और फिर उसके पश्चात आज-तक विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार के बलिदान दिए हैं यहां तक कि प्राणों को भी न्योछावर कर दिया है।
कल जहाँ भी गया, मैंने जम्मु शहर में तो जनसमूहों द्वारा प्रत्येक चौराहे, गली, मोहल्ले, झुग्गी, भवन, दूकान, शॉपिंग माल, स्कूल, कॉलेज, इत्यादि स्थान पर तिरंगे झंडे को शान से फहराते हुए देखा परन्तु गाऊँ में भी उत्साह कम नहीं था।
जम्मु शहर से कोई ६ किलोमीटर दूर पश्चिम में मुठी गाऊँ में रहने वाले कुछ किसानी करने वाले लोग गाय बछड़े को धूप में रख कर सजावटी पौधों की खेती करके प्रसन्नचित होते हुए दिखे। वैसे तो अब यह गाऊँ भी पूरी तरह से शहर में परिवर्तित हो गया है परन्तु गाऊँ की विशेषताएं भी संजोए हुए है। प्रातः काल यहां के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में स्थानीय प्रिंसिपल ने कर्मचारियों तथा नागरिकों के समक्ष तिरंगा लहराया। वार्ड नंबर ६७ के पौर श्री सूरज प्रकाश पाधा ने रणबीर नहर के किनारे गणमान्य लोगों की उपस्थिति में तिरंगा फहराया। श्री पाधा ने नागरिकों से स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग का अनुरोध किया।
मुठी से कोई ३ किलोमीटर दूर पश्चिम में वीरान पड़े हुए खेत दिखे जो या तो अधिक वर्षा के कारण बंजर पड़े थे या अब शहरीकरण की चपेट में आकर किसी नए निर्माण का इंतज़ार कर ररहे हैं। और आगे २ किलोमीटर दूर पश्चिम में अकलपुर गाऊँ में गेहूं की फसल सर्दी का प्रकोप सहने के पश्चात मुखर कर बाहिर आती हुई दिखती है। मौसम अनुकूल होने पर इसमें निखार आने के आसार हैं। कुछ दूर और आगे जाकर पता चलता है कि किसान कितना प्रगतिशील और निर्णय लेने में समक्ष होता जा रहा है। गेहूं जैसी परम्परागत फसल को छोड़ कर बंद गोभी जैसी फसलों की खेती उसकी कृषि -शैली का अंग बन गई है। पेड़ों के बीच में से छन कर निकलती हुई धूप ठण्ड से ठिठुरते प्राणी को रोमांचित भी करती है और उसमें नव चेतना और हर्सोल्लास की भावना का संचार करती है।
यही समय है जब पिछैती गेहूं की फसल में चौड़े पत्ते वाले खरपतवार की रोकथाम के लिए २,४, डी इथाइल एस्टर का छिड़काव किया जाना चाहिए। त्रिलोक चंद जी जैसे कई किसान मैंने इस कार्य में संलग्न पाए और कुछ लोग फसल में यूरिया उर्वरक भी छिटक कर उपयोग रहे थे।
थोड़ी सी दूरी पर आगे जा कर गेंदा फूलों की खेती देख कर मन और अधिक आनंदीत हुआ । कृषि प्रणाली में विविधीकरण कृषक की आय में बढ़ोतरी का उत्तम उपाय है, परन्तु कृषक की चाहिए कि वे संगठन के रूप में कार्य करें जिससे उन्हें बीज, खाद, दवाइयें इत्यादि सुलभ हों और प्रसंस्करण तथा विपणन (मार्केटिंग) में भी सुगमता हो। किसान भाई समझ लें कि प्रत्येक क्रिया में प्रत्येक स्तर पर शक्ति तो संगठन में ही है । हाँ, यह अवश्य है कि प्रत्येक क्रिया सकारात्मक ही होनी चाहिए।
वहीँ गाऊँ में आगे गुज्जर लोग कुल्ले बनाकर अपनी भैंस-गाय पालते हुए जीवनयापन करते हुए मिले। सभी लोगों का परस्पर सौहार्द देश को सशक्त करता है। स्वाभाविक है कि इन लोगों में भी अपनी जीवन शैली में सुधार लाने की प्रबल इच्छा है। सरकार को चाहिए कि इस समुदाय के लिए कोई ऐसी योजना बने जो इनके परम्परागत पशुपालन के व्यवसाय को उन्नत, सरल और अधिक लाभप्रद बना सके।
अकलपुर से कुछ ही दूर और आगे सरोडा गाउँ में सड़क के किनारे सेवा-निवृत्त वीर सैनिकों को अपने बच्चों, पोते-पोतियों और स्थानीय लोगों के साथ सेना के एक शहीद स्मारक पर भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गौरवान्वित होते हुए देखा। मैं भी नतमस्तक हुए बिना कैसे रहता? इसी गाऊँ में युवा किसान कुलदीप सिंह अपनी माता के साथ कडम फसल की रोपाई कर रहे थे। यह फसल विशेष प्रकार से कश्मीरी पंडितों की मन-भावन शाक-भाजी है। इसमें विटामिन और अन्य पौष्टिक तत्व के साथ स्वाद भी उत्तम होता है और अब देश के अन्य भागों में भी प्रचलित हो गई है। इसकी खेती किसान को कम लागत पर अधिक लाभ दे सकती है।
सरोड़ा से आगे घो - मनहासां की तरफ जाएं तो किसान अन्य फसलों जैसे तोरिअ, सरसों के साथ गन्ना भी उगाते हैं। कुछ प्रगतिशील किसान लीची की खेती कर रहे हैं और बीच में अंतरवर्तीय फसल जैसे गेहूं (दाने और चारे, दोनों के लिए) भी ले रहे हैं। प्रीतम सिंह जी सैनी जैसे किसान ब्रोक्कोली की खेती वृहद्द स्तर पर कर रहे हैं। यह प्रणाली उन्हें समृद्ध भी बना रही है।
आगे देवीपुर और भगतपुर की ओर जाते हुए मुझे यह देख कर ठीक नहीं लगा कि एक तो गेहूं जैसी फसल अधिक वर्षा में जलभराव के कारण दबी सी रह गई है वहीँ दूसरी ओर पॉलिथीन शीट और कचरा पानी संग ऊपर के इलाकों से बह कर निचले खेतों में एकत्रित हो गया है जो हानिकारक है।
भगतपुर चौक मेटाडोर स्टॉप के पास में पेड़ों के झुरमुट के नीचे साफ़-सुथरे टाइलों से सजे चौपाल को देख कर मन फिर से प्रफुल्लित हुआ। सन्देश मिला कि हमें प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर सचेत होना चाहिए और इस स्थिति से उबरना चाहिए।
गणतंत्र दिवस की इस लघु यात्रा से मेरा यह विश्वास और दृढ हुआ है कि यद्यपि देश की समृद्धि में एक-एक नागरिक का योगदान महत्त्व रखता है परन्तु सामूहिक तौर पर "जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान" ही एक ऐसा मन्त्र है जो "जय हिन्द" के उद्घोष को चरितार्थ करता है !
सी.एम.शर्मा
वैसे तो शायद ही कोई दिन होगा जब जवान और किसान घरों में बैठते हों। वे जानते हैं कि यदि वे घर में बैठे रहें तो सीमाओं पर घुसपैठ और सड़कों पर अराजकता कौन रोकेगा, मातृभूमि की संतान को अन्न उपलब्ध कौन कराएगा, कल-कारखानों के लिए कच्चा माल और न केवल मानव जाति अपितु पशु धन के लिए भी आहार कौन उपलब्ध कराएगा ! परन्तु आज वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर पिछले कुछ माह की सर्दी, वर्षा और हिमपात के उपरान्त सुखद मौसम का आनंद लेने के साथ-साथ अपने कर्तव्य को निभाने सीमाओं और खेतों में डट गए थे।
यह देश का गणतंत्र ही है जो सभी नागरिकों को सुखी एवं सम्मानित जीवन जीने के अधिकार देता है। यह गणतंत्र सरकार पर न्याय एवं विधान का सम्मान करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा निश्चित करने का दायित्व भी सौंपता है। यही गणतंत्र है जो प्रत्येक नागरिक पर देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को भी निश्चित करता है। यदि देश के नागरिक जिम्मेदारियें न निभाएं तो वे सुरक्षित कैसे रह पाएंगे। अराजकता किसी को लाभ नहीं सकती।
इस गणतंत्र की रक्षा के लिए असंख्य बाल, नवयुवक, वृद्ध स्त्री-पुरुषों ने स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और फिर उसके पश्चात आज-तक विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार के बलिदान दिए हैं यहां तक कि प्राणों को भी न्योछावर कर दिया है।
कल जहाँ भी गया, मैंने जम्मु शहर में तो जनसमूहों द्वारा प्रत्येक चौराहे, गली, मोहल्ले, झुग्गी, भवन, दूकान, शॉपिंग माल, स्कूल, कॉलेज, इत्यादि स्थान पर तिरंगे झंडे को शान से फहराते हुए देखा परन्तु गाऊँ में भी उत्साह कम नहीं था।
जम्मु शहर से कोई ६ किलोमीटर दूर पश्चिम में मुठी गाऊँ में रहने वाले कुछ किसानी करने वाले लोग गाय बछड़े को धूप में रख कर सजावटी पौधों की खेती करके प्रसन्नचित होते हुए दिखे। वैसे तो अब यह गाऊँ भी पूरी तरह से शहर में परिवर्तित हो गया है परन्तु गाऊँ की विशेषताएं भी संजोए हुए है। प्रातः काल यहां के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में स्थानीय प्रिंसिपल ने कर्मचारियों तथा नागरिकों के समक्ष तिरंगा लहराया। वार्ड नंबर ६७ के पौर श्री सूरज प्रकाश पाधा ने रणबीर नहर के किनारे गणमान्य लोगों की उपस्थिति में तिरंगा फहराया। श्री पाधा ने नागरिकों से स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग का अनुरोध किया।
मुठी से कोई ३ किलोमीटर दूर पश्चिम में वीरान पड़े हुए खेत दिखे जो या तो अधिक वर्षा के कारण बंजर पड़े थे या अब शहरीकरण की चपेट में आकर किसी नए निर्माण का इंतज़ार कर ररहे हैं। और आगे २ किलोमीटर दूर पश्चिम में अकलपुर गाऊँ में गेहूं की फसल सर्दी का प्रकोप सहने के पश्चात मुखर कर बाहिर आती हुई दिखती है। मौसम अनुकूल होने पर इसमें निखार आने के आसार हैं। कुछ दूर और आगे जाकर पता चलता है कि किसान कितना प्रगतिशील और निर्णय लेने में समक्ष होता जा रहा है। गेहूं जैसी परम्परागत फसल को छोड़ कर बंद गोभी जैसी फसलों की खेती उसकी कृषि -शैली का अंग बन गई है। पेड़ों के बीच में से छन कर निकलती हुई धूप ठण्ड से ठिठुरते प्राणी को रोमांचित भी करती है और उसमें नव चेतना और हर्सोल्लास की भावना का संचार करती है।
यही समय है जब पिछैती गेहूं की फसल में चौड़े पत्ते वाले खरपतवार की रोकथाम के लिए २,४, डी इथाइल एस्टर का छिड़काव किया जाना चाहिए। त्रिलोक चंद जी जैसे कई किसान मैंने इस कार्य में संलग्न पाए और कुछ लोग फसल में यूरिया उर्वरक भी छिटक कर उपयोग रहे थे।
थोड़ी सी दूरी पर आगे जा कर गेंदा फूलों की खेती देख कर मन और अधिक आनंदीत हुआ । कृषि प्रणाली में विविधीकरण कृषक की आय में बढ़ोतरी का उत्तम उपाय है, परन्तु कृषक की चाहिए कि वे संगठन के रूप में कार्य करें जिससे उन्हें बीज, खाद, दवाइयें इत्यादि सुलभ हों और प्रसंस्करण तथा विपणन (मार्केटिंग) में भी सुगमता हो। किसान भाई समझ लें कि प्रत्येक क्रिया में प्रत्येक स्तर पर शक्ति तो संगठन में ही है । हाँ, यह अवश्य है कि प्रत्येक क्रिया सकारात्मक ही होनी चाहिए।
वहीँ गाऊँ में आगे गुज्जर लोग कुल्ले बनाकर अपनी भैंस-गाय पालते हुए जीवनयापन करते हुए मिले। सभी लोगों का परस्पर सौहार्द देश को सशक्त करता है। स्वाभाविक है कि इन लोगों में भी अपनी जीवन शैली में सुधार लाने की प्रबल इच्छा है। सरकार को चाहिए कि इस समुदाय के लिए कोई ऐसी योजना बने जो इनके परम्परागत पशुपालन के व्यवसाय को उन्नत, सरल और अधिक लाभप्रद बना सके।
अकलपुर से कुछ ही दूर और आगे सरोडा गाउँ में सड़क के किनारे सेवा-निवृत्त वीर सैनिकों को अपने बच्चों, पोते-पोतियों और स्थानीय लोगों के साथ सेना के एक शहीद स्मारक पर भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए गौरवान्वित होते हुए देखा। मैं भी नतमस्तक हुए बिना कैसे रहता? इसी गाऊँ में युवा किसान कुलदीप सिंह अपनी माता के साथ कडम फसल की रोपाई कर रहे थे। यह फसल विशेष प्रकार से कश्मीरी पंडितों की मन-भावन शाक-भाजी है। इसमें विटामिन और अन्य पौष्टिक तत्व के साथ स्वाद भी उत्तम होता है और अब देश के अन्य भागों में भी प्रचलित हो गई है। इसकी खेती किसान को कम लागत पर अधिक लाभ दे सकती है।
सरोड़ा से आगे घो - मनहासां की तरफ जाएं तो किसान अन्य फसलों जैसे तोरिअ, सरसों के साथ गन्ना भी उगाते हैं। कुछ प्रगतिशील किसान लीची की खेती कर रहे हैं और बीच में अंतरवर्तीय फसल जैसे गेहूं (दाने और चारे, दोनों के लिए) भी ले रहे हैं। प्रीतम सिंह जी सैनी जैसे किसान ब्रोक्कोली की खेती वृहद्द स्तर पर कर रहे हैं। यह प्रणाली उन्हें समृद्ध भी बना रही है।
आगे देवीपुर और भगतपुर की ओर जाते हुए मुझे यह देख कर ठीक नहीं लगा कि एक तो गेहूं जैसी फसल अधिक वर्षा में जलभराव के कारण दबी सी रह गई है वहीँ दूसरी ओर पॉलिथीन शीट और कचरा पानी संग ऊपर के इलाकों से बह कर निचले खेतों में एकत्रित हो गया है जो हानिकारक है।
भगतपुर चौक मेटाडोर स्टॉप के पास में पेड़ों के झुरमुट के नीचे साफ़-सुथरे टाइलों से सजे चौपाल को देख कर मन फिर से प्रफुल्लित हुआ। सन्देश मिला कि हमें प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर सचेत होना चाहिए और इस स्थिति से उबरना चाहिए।
गणतंत्र दिवस की इस लघु यात्रा से मेरा यह विश्वास और दृढ हुआ है कि यद्यपि देश की समृद्धि में एक-एक नागरिक का योगदान महत्त्व रखता है परन्तु सामूहिक तौर पर "जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान" ही एक ऐसा मन्त्र है जो "जय हिन्द" के उद्घोष को चरितार्थ करता है !
सी.एम.शर्मा