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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

शिकायत

 

हिन्दू से शिकायत है "क्यों अब तक हिन्दू बना नहीं?"

मुस्लिम से भी यही प्रश्न है "क्यों वह मुस्लिम बना नहीं:"

क्यों हिन्दू ज्ञान गंवा बैठा? क्यों मुस्लिम सोच गंवा बैठा?

क्यों मानव 'मानव'  बना नहीं? क्यों मन मंदिर में दया  नहीं ?

 

क्यों आदम-खोर बने हैं अब सब ? कुदरत का सम्मान क्यों नहीं ?

खेत और खलिहान मिटाए, पेड़ों का भी मान क्यों नहीं?

भूख बढ़ी इतनी है क्यों अब? निर्बल का अधिकार क्यों नहीं?

नीर आँख से सूख गया क्यों? जीवन का सत्कार क्यों  नहीं ?

 

ईश्वर  के सम्मान  में हमने ऊँचे - ऊँचे महल बनाए,

सोने-चाँदी के गहनों से, कर्ता के रूप अनेक सजाए।         

फिर भी अबलाएं रोती हैं, बच्चों का अपहरण हो रहा,

निर्धनता मुँह खोल के बैठी, सड़कों पर इंसान सो रहा।

 

उठो अब अपने धर्म को जानो, सेवा के सन्देश को मानो। 

प्रेम करो उसकी रचना से, वैर-भाव हिंसा को त्यागो।

उस असीम की शक्ति का कुछ मान करो, कुछ ध्यान करो,

इन शोषित, दीन दुखी देहों में खुदा छिपा है, वह पहचानो। 




 

नया संकल्प 

 

दुनिया वालों से कह दो कि  अब वे चले गए हैं दिन 

आते थे जब हमलावर और होता था चौहाण पतन। 

 

नहीं बनेंगे  सोने की चिड़िया , व्याध से लोहा लेना है ,

देश-द्रोही को दण्डित कर के माँ को गौरव देना है । 

 

स्वयं जियो और जीने दो के सिद्धांत को देंगे कभी जो ठेस,

उनको भूमण्डल में हमने  नहीं कहीं रखना है शेष। 

 

संसार से जाओ यह कह दो, "अभिमन्यु नहीं मरेगा अब,

एक-एक क्या, सात व्यूह हों जीत के ही दम लेगा अब। 

 

सोने की चिड़िया नहीं बनेंगे, बनेंगे मानवता की लाज,

मानव की हम मदद करेंगे दानव को चीरेंगे आज। 

कुछ सीखो 


केले के छिलके को भैया राहों में न फेंको,

इन पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो।

 

वहां के सारे लोग हंसेंगे, उसको देंगे ताना ,

चलने की  जो शिक्षा चाहिए, तुम फौजी बन जाना। 

 

बेचारा तो उठ न सकेगा, कहेगी पीड़ा "चीखो"

लोग वहाँ  पर यही कहेंगे "चलना तो भैया सीखो"

 

मुँह पीला करके हँस  देगा, उठेगा लाज के मारे,

कहेगा "तुम सब सच्चे हो, हैं सारे दोष हमारे"।

 

खून का घूँट पियेगा घायल, भावुक हो रोने को,

नहीं सहारा देगा कोई उसे खड़ा होने को। 

 

स्वयं पूछ लो ह्रदय से अपने, रहा है क्या कहने को,

मेरी तरह समझ लो तुम भी सभी को यह कहने को,

 

केले के छिलके को भैया राहों में न फेंको,

इस पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो"। 


सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

आह्वान

 

मानवता की हवा बहे,

ये बंटवारे सब ढह  जाएं,

नफरत की आंधी ठंडी हो,

आओ सब मिल कर यत्न  करें। 

 

हम सभ्य बनें, सब वीर बनें,

और लाज रखें मर्यादा की,

सूरज सा रूप खिले भारत का,

मानवता का जाप करें। 

 

हम सभी सत्य व्रत धारी हों,

सब  प्रेम के अडिग पुजारी हों,

अमृत की बरसात करें,

सौहार्द के सब जन अनुचर हों। 

 

सब खिलें यहाँ "मत" पंकज बन कर,

गुण - ग्राहक जग से आएं ,

हम सुख बांटें, हम खुशियाँ  दे दें,

ज्ञान क्षुधा अब तृप्त  करें। 

 

हम मूल मन्त्र प्रगति का धारें, 

मिल-जुल कर सहयोग करें,

सब कर्म-यज्ञ में शामिल हो कर,

देश की विपदा दूर करें।