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सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

आह्वान

 

मानवता की हवा बहे,

ये बंटवारे सब ढह  जाएं,

नफरत की आंधी ठंडी हो,

आओ सब मिल कर यत्न  करें। 

 

हम सभ्य बनें, सब वीर बनें,

और लाज रखें मर्यादा की,

सूरज सा रूप खिले भारत का,

मानवता का जाप करें। 

 

हम सभी सत्य व्रत धारी हों,

सब  प्रेम के अडिग पुजारी हों,

अमृत की बरसात करें,

सौहार्द के सब जन अनुचर हों। 

 

सब खिलें यहाँ "मत" पंकज बन कर,

गुण - ग्राहक जग से आएं ,

हम सुख बांटें, हम खुशियाँ  दे दें,

ज्ञान क्षुधा अब तृप्त  करें। 

 

हम मूल मन्त्र प्रगति का धारें, 

मिल-जुल कर सहयोग करें,

सब कर्म-यज्ञ में शामिल हो कर,

देश की विपदा दूर करें। 







 

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