अटल सन्देश - अटल जी के नाम
ऐ गीतकार, युग शिल्पकार !
अब गीत सृजन के नए बुनो तुम,
मानव का कवि-मन जागे, मानवता का गुण-गान करो
तुम।
द्वार दिलों के
वे खोलो जो घृणा-द्वेष को मिटा सकें,
वे छंद लिखो जो मानवता की मर्यादा का मान रख सकें।
रीत प्रीत की, गूँज गीत की, अस्त्र-शस्त्र ,से ताकतवर है ,
बंटवारे की सीमा तोड़ें, ह्रदय के उद्गारों
में बल है।
गीत दिलों को जोड़ लेते हैं, गीत ह्रदय के भ्रमर का गुंजन ,
गीत ह्रदय से जो उपजें, वे गीत ऊसर को करते मधुबन ।
गीत
होंठ पर जब है आते, कहाँ छिपे रहते फिर राज़ ,
पत्थर जैसे भारी दिल भी, लेते हैं लम्बी परवाज़।
फ़ख़र नहीं है
किसे इस दिल पर, निज दिल पर न
किसे है नाज़,
ये सब हैं दिल की बातें और हर एक दिल में कई महाज़।
दिल में जंग के
बादल भी हैं, प्यार के सागर भी हैं दिल में,
तोड़ें जो दीवारें दिल की, रस के भरे गीत दिल
में हैं।
फ़ख़र हमें इन गीतों पर है, गीतों की भावुकता पर
है,
जिस संस्कृति में संत रमे हैं, उनके वचनों-कर्मों पर
है।
नानक, गौतम संत
यहां हैं, वाल्मीकि, चैतन्य, जनक, हैं,
मीरा औ' रहीम तुल्य भी, "मदर टेरेसा जैसे धनक हैं।
राम प्रेरणा स्रोत हमारे, शिव-शंकर हर कण-कण
में हैं।
त्याग भावना ने हम सब को, सहन-शक्तियुत सबल
किया है,
प्रेम और सद्भाव की खातिर खून
का हमने दान दिया है।
फिर भी यदा - कदा कैकेई की
मति नियति ने फेरी है,
उसे पता क्या राम - भारत के बीच नहीं कोई दूरी है!
जुदा हुए परिवार
तो क्या, अब भी संधि का मौका है,
जो हैं भटके और क्षुब्ध हुए हैं, मिलें तो फिर किसने रोका
है?
छोड़ चुके जो हाथ
मिलाना द्वेष छोड़ वे होश में आएं,
मानवता की खुली डगर पर प्रेम के जग-मग दीप जलाएं।
आज मिलन की बेला है, अब मन-तरंग का ज़ोर दिखाओ,
ऐ कविमन नेतृत्व
दिखाओ,
"खून से बिछड़ा खून मिलाओ!
खून से बिछड़ा
खून मिलाओ!! खून से बिछड़ा खून मिलाओ!!
_____(शारदा लाल, भद्रवाह।
यह कविता मैंने तब लिखी जब अटल बिहारी वाजपेयी जी
मित्रता का हाथ बढ़ाने भारत के प्रधान मंत्री के रूप में पकिस्तान के लाहौर शहर पहुंचे थे। हमें अभी भी यह आशा है कि वाजपेयी जी का यह मिशन, जो सभी
सकारात्मक सोच रखने वाले भारतीयों
और पाकिस्तानियों का प्रतिनिधित्व करता है शीघ्र ही सफल
होगा । हमारी अंतरआत्मा से वाजपेयी जी और उनकी सोच को श्रद्धापूर्वक नमन!)