स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता आंदोलन के कारकों को भी याद करें
(शारदा लाल, भद्रवाह )
यह कैसी विडंबना है कि जो उद्देश्य और प्रेरणा स्रोत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारक बने, स्वतंत्र भारत के बहुत से नागरिक आज उन्हें तुच्छ समझने लगे हैं। मंगल पांडे और उनके सहयोगियों ने अपने जीवन की आहुति इस लिए दी की उन्हें अंग्रेजी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का शक था। अपनी संस्कृति और धर्म को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने ऐसे कारतूस को मुंह लगाने के बदले अपने प्राण न्योछावर कर देना श्रेयस्कर समझा ।
भारत एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) देश है। इसका अर्थ यह नहीं की यहां के नागरिक धर्म को नहीं मानते। वास्तविक बात तो यह है कि यहां की जनता धार्मिक प्रवृति की है। धार्मिक होना अच्छी बात है परन्तु साथ में यह भी ध्यान रखने की बात है कि सभी लोग एक-दुसरे की धार्मिक भावनाओं का आदर करना अपना कर्त्तव्य समझें। सेकुलरिज्म का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं धार्मिक होते हुए कोई ऐसी बात या ऐसा काम न करे जिससे दूसरे की धार्मिक भावनायें आहत हों । जिस गाय को एक व्यक्ति माता कहता है उसका यदि कोई वध करे तो ऐसी व्यवस्था से गौमाता कहने वाले का निराश होना स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में गौहत्या बंद करने की ओर कदम उठाना निहित है। तो फिर इसे यथा-शीघ्र बंद कर ही देना उचित है। लेकिन इस काम में सभी सरकारों को समझदारी से यथाशीघ्र कदम उठाने चाहियें। सरकारों द्वारा बहस में उलझने के बदले हर तरह की हिंसा रोकने के लिए कारगर कदम उठाने चाहियें।
दूसरी ओर क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए की शहीद अशफाकुल्लाह खान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, शहीद हवलदार अब्दुल हमीद, आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान शाहनवाज़ खान, सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अभिनेता दलीप कुमार और असंख्य मुस्लिम समुदाय के व्यक्तित्व भारत के लिए बेजोड़ काम करते गए और इसे समृद्ध बनाते गए। भारतवर्ष तभी एक सशक्त एवं समृद्ध राज्य बन सकता है जब हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, इत्यादि अपने धर्म, त्यौहार ख़ुशी से मना सकें, हिंसा - घृणा का त्याग करें, विकास के प्रयास करें और विकास के लाभ का मिल बाँट कर उपभोग करें।
यह भारत देश ही है जहाँ की सम्पन्नता की बातें सुन कर विदेशों लोग किसी न किसी कारण से यहां आते रहे हैं। अमेरिका की खोज तो कोलंबस ने सन्न १४९२ में आज से केवल ५२५ वर्ष पूर्व ही की थी परन्तु भारत में आने वाले विदेशी हज़ारों वर्षों से कभी तो आक्रामक बन कर आये, कभी शरणार्थी, कभी ज्ञान वर्धन के लिए और कभी व्यापारी बनकर।
कहा तो यह भी जाता है कि आर्य लोग भारत में आज से लगभग ३५०० वर्ष पूर्व आये जो की अभी विवादास्पद है। ग्रीस के शासक सिकंदर महान और सेलुकस निकाटोर (ईसा से ३२६ से ३२४ वर्ष पूर्व), इतिहासकार मैगेस्थनीज़ ( ३०२ से २९८ वर्ष पूर्व ), कुषाण, इत्यादि (ईसा से २०० वर्ष पूर्व से लेकर सन्न ३०० ईस्वी तक), हुन पांचवीं और छठी शताब्दी के बीच आक्रमण करते रहे और यहां की संस्कृति में ढलते गए। फ हैं (३९९ से ४१२ ईस्वी), हिउएन तसंग (६२९ से ६४५ ईस्वी), अल बेरुनी (१००० से १०२५ ईस्वी), मार्को-पोलो (१२५४ से १३२४ ईस्वी) ज्ञान वर्धन एवं सैलानी के रूप में भारत आये। अरब से मोहम्मद बिन क़ासिम ने ७१२ ईस्वी में सिंध पर आक्रमण किया। मोहम्मद ग़ज़नी ने १००० ईस्वी में आकर लूट--पाट की और वापिस चले गया। यह मोहम्मद गौरी था जिसने ११९४ ईस्वी में आक्रमण के बाद दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया। उसने भारत की संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का सिक्का जमाना शुरू किया जो तैमूर (१३९८ ईस्वी) के आक्रमण और फिर मुग़ल साम्राज्य की १५२६ ईस्वी में स्थापना के पश्चात बढ़ता ही गया। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली का क्रूर आक्रमण १७३९ से १७६७ ईस्वी के बीच भारत पर हुआ जिसमे कई लोग मारे गए और सम्पति को भारी नुक्सान हुआ।
पुर्तगाल से अल्फोंसो दे अल्बुकर ने गोवा पर १५१० ईस्वी में अपना अधिपत्य जमाया। इस बीच फ्रेंच, डच, डेन भी आये जिनका मक़सद मुख्यता व्यापार था। वर्ष १७५७ के उपरांत अँगरेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की शकल में और फिर ब्रिटिश साम्राज्य की शकल में पूरे भारतवर्ष पर पहले तो व्यापार के लिए और फिर शासन (कु :शासन ) के लिए स्थापित हो गए। अशोक चौरे (२०१७) के एक सादा और न्यूनतम अनुमान के अनुसार लगभग दो शताब्दी के अपने शासनकाल में अंग्रेज़ों ने भारत से ६०० ट्रिलियन पौंड की लूट और चोरी की जिसे भारत को लौटाया जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने १८७० के दशक में लिखी हुई अपनी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" में सन्न १८५७ उपरांत के अनुमान से प्रति वर्ष ४ मिलियन पौंड की लूट बताई थी। इस समय से पूर्व की लूट २ मिलियन पौंड प्रति वर्ष आंकी गई है और इसमें ७.५ प्रतिशत कम्पौंड इंटरेस्ट भी शामिल किया गया है।
अँगरेज़ पहले तो देश के मुस्लिम नवाबों और शासकों के विरुद्ध लड़ते रहे और फिर पैंतरा बदल कर हिन्दू शासकों के विरुद्ध दमनकारी चालें चलते रहे। अंत में उन्होंने दोनों पक्षों को आपस में लड़ने के लिए असहिष्णुता और अनादर का तरीका निकाला और भारतवर्ष को १४/१५ अगस्त १९४७ के दिन आज़ादी देकर दो देशों हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बाँट दिया। १९७१ में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की लगातार बढ़ती हुई हठधर्मी के कारण पाकिस्तान भी टूटा और बांग्लादेश बना। अभी भी अंग्रेज़ों ने अपने सामरिक और व्यापारिक अधिपत्य को बनाये रखने के लिए इस उप-महाद्वीप में "फुट डालो और राज्य करो" की नीति नहीं छोड़ी है।
भारत का संविधान जो कि शक्ति और हिम्मत, शांति और सत्य, निरंतर विकास, समानता, धर्म के आदर और समरसता का वाहक है और सामाजिक न्याय का प्रतीक है, उसे सच्ची निष्ठा से लागू करने से ही निर्धन, शोषित, दलित, और कमज़ोर वर्ग का कल्याण हो सकता है। संपन्न वर्ग को स्वेच्छा से कुछ त्याग के लिए भी तैयार रहना चाहिए। तर्कसंगत टेक्स प्रणाली, आरक्षण सुविधा और प्रत्येक मनुष्य के जान-माल और सम्मान की सुरक्षा कानूनी और सामाजिक तौर पर इस तरह से सुनिश्चित होनी चाहिए कि वह भारतीयता में स्वयं को पूरी तरह भागीदार समझे, भारतीयता में अपनी सुरक्षा समझे और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहे। इस मार्ग में सरकार का दायित्व बहुत बड़ा है। कानून का राज्य स्थापित करना आवश्यक है। चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और खर्चे पर अंकुश, करप्शन को हटाना, ग्रामीण विकास और निराश्रितों को आश्रय देना स्वतंत्र भारत की अभी भी बहुत बड़ी चुनौती है। कानून का उल्लंघन करने वालों को समझा-बुझा कर और दंड दे कर क़ानून के दायरे में लाना होगा और पालन करने वाले को मान-सम्मान देना होगा। राजनीतिज्ञों और सरकारी अफसरशाहों का इस ओर उन्मुखीकरण परम आवश्यक है तभी भारत में सुराज और सुशासन स्थापित होगा।
(शारदा लाल, भद्रवाह )
यह कैसी विडंबना है कि जो उद्देश्य और प्रेरणा स्रोत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारक बने, स्वतंत्र भारत के बहुत से नागरिक आज उन्हें तुच्छ समझने लगे हैं। मंगल पांडे और उनके सहयोगियों ने अपने जीवन की आहुति इस लिए दी की उन्हें अंग्रेजी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का शक था। अपनी संस्कृति और धर्म को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने ऐसे कारतूस को मुंह लगाने के बदले अपने प्राण न्योछावर कर देना श्रेयस्कर समझा ।
भारत एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) देश है। इसका अर्थ यह नहीं की यहां के नागरिक धर्म को नहीं मानते। वास्तविक बात तो यह है कि यहां की जनता धार्मिक प्रवृति की है। धार्मिक होना अच्छी बात है परन्तु साथ में यह भी ध्यान रखने की बात है कि सभी लोग एक-दुसरे की धार्मिक भावनाओं का आदर करना अपना कर्त्तव्य समझें। सेकुलरिज्म का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं धार्मिक होते हुए कोई ऐसी बात या ऐसा काम न करे जिससे दूसरे की धार्मिक भावनायें आहत हों । जिस गाय को एक व्यक्ति माता कहता है उसका यदि कोई वध करे तो ऐसी व्यवस्था से गौमाता कहने वाले का निराश होना स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में गौहत्या बंद करने की ओर कदम उठाना निहित है। तो फिर इसे यथा-शीघ्र बंद कर ही देना उचित है। लेकिन इस काम में सभी सरकारों को समझदारी से यथाशीघ्र कदम उठाने चाहियें। सरकारों द्वारा बहस में उलझने के बदले हर तरह की हिंसा रोकने के लिए कारगर कदम उठाने चाहियें।
दूसरी ओर क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए की शहीद अशफाकुल्लाह खान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, शहीद हवलदार अब्दुल हमीद, आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान शाहनवाज़ खान, सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अभिनेता दलीप कुमार और असंख्य मुस्लिम समुदाय के व्यक्तित्व भारत के लिए बेजोड़ काम करते गए और इसे समृद्ध बनाते गए। भारतवर्ष तभी एक सशक्त एवं समृद्ध राज्य बन सकता है जब हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, इत्यादि अपने धर्म, त्यौहार ख़ुशी से मना सकें, हिंसा - घृणा का त्याग करें, विकास के प्रयास करें और विकास के लाभ का मिल बाँट कर उपभोग करें।
यह भारत देश ही है जहाँ की सम्पन्नता की बातें सुन कर विदेशों लोग किसी न किसी कारण से यहां आते रहे हैं। अमेरिका की खोज तो कोलंबस ने सन्न १४९२ में आज से केवल ५२५ वर्ष पूर्व ही की थी परन्तु भारत में आने वाले विदेशी हज़ारों वर्षों से कभी तो आक्रामक बन कर आये, कभी शरणार्थी, कभी ज्ञान वर्धन के लिए और कभी व्यापारी बनकर।
कहा तो यह भी जाता है कि आर्य लोग भारत में आज से लगभग ३५०० वर्ष पूर्व आये जो की अभी विवादास्पद है। ग्रीस के शासक सिकंदर महान और सेलुकस निकाटोर (ईसा से ३२६ से ३२४ वर्ष पूर्व), इतिहासकार मैगेस्थनीज़ ( ३०२ से २९८ वर्ष पूर्व ), कुषाण, इत्यादि (ईसा से २०० वर्ष पूर्व से लेकर सन्न ३०० ईस्वी तक), हुन पांचवीं और छठी शताब्दी के बीच आक्रमण करते रहे और यहां की संस्कृति में ढलते गए। फ हैं (३९९ से ४१२ ईस्वी), हिउएन तसंग (६२९ से ६४५ ईस्वी), अल बेरुनी (१००० से १०२५ ईस्वी), मार्को-पोलो (१२५४ से १३२४ ईस्वी) ज्ञान वर्धन एवं सैलानी के रूप में भारत आये। अरब से मोहम्मद बिन क़ासिम ने ७१२ ईस्वी में सिंध पर आक्रमण किया। मोहम्मद ग़ज़नी ने १००० ईस्वी में आकर लूट--पाट की और वापिस चले गया। यह मोहम्मद गौरी था जिसने ११९४ ईस्वी में आक्रमण के बाद दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया। उसने भारत की संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का सिक्का जमाना शुरू किया जो तैमूर (१३९८ ईस्वी) के आक्रमण और फिर मुग़ल साम्राज्य की १५२६ ईस्वी में स्थापना के पश्चात बढ़ता ही गया। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली का क्रूर आक्रमण १७३९ से १७६७ ईस्वी के बीच भारत पर हुआ जिसमे कई लोग मारे गए और सम्पति को भारी नुक्सान हुआ।
पुर्तगाल से अल्फोंसो दे अल्बुकर ने गोवा पर १५१० ईस्वी में अपना अधिपत्य जमाया। इस बीच फ्रेंच, डच, डेन भी आये जिनका मक़सद मुख्यता व्यापार था। वर्ष १७५७ के उपरांत अँगरेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की शकल में और फिर ब्रिटिश साम्राज्य की शकल में पूरे भारतवर्ष पर पहले तो व्यापार के लिए और फिर शासन (कु :शासन ) के लिए स्थापित हो गए। अशोक चौरे (२०१७) के एक सादा और न्यूनतम अनुमान के अनुसार लगभग दो शताब्दी के अपने शासनकाल में अंग्रेज़ों ने भारत से ६०० ट्रिलियन पौंड की लूट और चोरी की जिसे भारत को लौटाया जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने १८७० के दशक में लिखी हुई अपनी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" में सन्न १८५७ उपरांत के अनुमान से प्रति वर्ष ४ मिलियन पौंड की लूट बताई थी। इस समय से पूर्व की लूट २ मिलियन पौंड प्रति वर्ष आंकी गई है और इसमें ७.५ प्रतिशत कम्पौंड इंटरेस्ट भी शामिल किया गया है।
अँगरेज़ पहले तो देश के मुस्लिम नवाबों और शासकों के विरुद्ध लड़ते रहे और फिर पैंतरा बदल कर हिन्दू शासकों के विरुद्ध दमनकारी चालें चलते रहे। अंत में उन्होंने दोनों पक्षों को आपस में लड़ने के लिए असहिष्णुता और अनादर का तरीका निकाला और भारतवर्ष को १४/१५ अगस्त १९४७ के दिन आज़ादी देकर दो देशों हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बाँट दिया। १९७१ में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की लगातार बढ़ती हुई हठधर्मी के कारण पाकिस्तान भी टूटा और बांग्लादेश बना। अभी भी अंग्रेज़ों ने अपने सामरिक और व्यापारिक अधिपत्य को बनाये रखने के लिए इस उप-महाद्वीप में "फुट डालो और राज्य करो" की नीति नहीं छोड़ी है।
भारत का संविधान जो कि शक्ति और हिम्मत, शांति और सत्य, निरंतर विकास, समानता, धर्म के आदर और समरसता का वाहक है और सामाजिक न्याय का प्रतीक है, उसे सच्ची निष्ठा से लागू करने से ही निर्धन, शोषित, दलित, और कमज़ोर वर्ग का कल्याण हो सकता है। संपन्न वर्ग को स्वेच्छा से कुछ त्याग के लिए भी तैयार रहना चाहिए। तर्कसंगत टेक्स प्रणाली, आरक्षण सुविधा और प्रत्येक मनुष्य के जान-माल और सम्मान की सुरक्षा कानूनी और सामाजिक तौर पर इस तरह से सुनिश्चित होनी चाहिए कि वह भारतीयता में स्वयं को पूरी तरह भागीदार समझे, भारतीयता में अपनी सुरक्षा समझे और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहे। इस मार्ग में सरकार का दायित्व बहुत बड़ा है। कानून का राज्य स्थापित करना आवश्यक है। चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और खर्चे पर अंकुश, करप्शन को हटाना, ग्रामीण विकास और निराश्रितों को आश्रय देना स्वतंत्र भारत की अभी भी बहुत बड़ी चुनौती है। कानून का उल्लंघन करने वालों को समझा-बुझा कर और दंड दे कर क़ानून के दायरे में लाना होगा और पालन करने वाले को मान-सम्मान देना होगा। राजनीतिज्ञों और सरकारी अफसरशाहों का इस ओर उन्मुखीकरण परम आवश्यक है तभी भारत में सुराज और सुशासन स्थापित होगा।
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