अब आवश्यक है मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित सिफारिशों पर उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का फसलों में उपयोग करना
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (नमसा) के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण और अत्यंत महत्त्वाकांक्षी योजना है। इस योजना का शुभारंभ १७ फरवरी २०१५ को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में किया। श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अगर किसान इसे अपना लेते हैं तो प्रति तीन एकड़ में कम से कम ५० हजार रूपये बचा सकते हैं। खेती बाड़ी का तरीका मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर होना चाहिए।
इस योजना के अंतर्गत किसानों को उनके खेतों में बोई जाने वाली फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और उर्वरकों को उपयोग करने की सलाह प्रयोगशाला में मिटटी के नमूने की जाँच के आधार पर प्राप्त नतीजे के मुताबिक ही दी जाती है, ताकि किसान अच्छी पैदावार का लाभ उठा सकें।
कृषि विभाग के अधिकारी एवं प्रचार - प्रसार कार्यकर्ता पिछले ४ वर्षों से इस विषय में किसानों को जाग्रत करते रहे हैं। अपने निजी एंड्राइड मोबाइल फोन की सहायता से उन्होंने खेतों की मिटटी के उपयुक्त नमूने अक्षांश और लोंगिट्ठे ढूंढ कर इकठा किये हैं और विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला में भी दिए। वैज्ञानिक ढंग से लाखों की संख्या में अन्य प्रांतों की तरह जम्मू कश्मीर राज्य में भी इन मिटटी के नमूनों का विश्लेषण हुआ। योजना के दिशा निर्देश अनुसार लगभग १० गुना की संख्या में किसान परिवारों के बीच इन नतीजों का ब्यौरा मृदा स्वास्थ्य कार्ड (साइल हेल्थ कार्ड्स) में दर्ज किया गया और फिर इन साइल हेल्थ कार्ड्स का वितरण भी हुआ।
विश्लेषण के द्वारा मिटटी में मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा और बोई या रोपी जाने वाली फसल में कितनी खाद और पोषक तत्वों का उपयोग करना है इसका पता भी चल जाता है । किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती है।
पहले तो सरकार का लक्ष्य सभी किसान परिवारों को ३ वर्षों में कवर करने का था परन्तु फिर इसे घटा कर २ वर्ष ही कर दिया गया। इस तरह से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का पहला चक्र २०१६--१७ में पूरा हुआ और अब दूसरा शुरू हो गया है। आशा तो बंधी है की सरकार के प्रयासों से और कृषि विषेशज्ञों के योगदान से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का अध्ययन करके एक अच्छी फसल प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
इस योजना के अंतर्गत सरकार का प्रति २ साल के अन्दर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्ड में एक विवरण छपता है जो किसानों को अपने खेत या जमीन के लिए २ साल में एक बार दिया जाना चाहिए । इस योजना के अंतर्गत मोबाइल मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएंस्थापित करने के लिए रूपये आबंटित भी किये गये हैं, ताकि किसानों को सही परीक्षण की सुविधा मिल सके और खेतों में फसलें लहलहा सकें। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में किसी खेत विशेष की मृदा का ब्यौरा होता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में हैं और उसमें बोई गई फसलों को किस मात्रा में कौन सा उर्वरक दिया जाना चाहिए।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के पहले दो वर्षीय चक्र (२०१५-१७) में ३१ मई २०१७ तक २.५३ करोड़ लक्षित नमूने एकत्र किये गये थे और २.२२ करोड़ (९३ प्रतिशत) नमूनों का परीक्षण किया गया था । लगभग १०.७४ करोड़ लाभार्थियों के लिये ये कार्ड भेजे गए थे और ०६.०३ करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत भी किये गए थे।
दुसरे दो वर्षीय चक्र (२०१७-१९) के लक्ष्य २.४४ करोड़ एकत्रित मृदा स्वास्थ्य कार्ड में से १.३० करोड़ नमूनों का विश्लेषण किया जा चुका है । लगभग ४.२४ करोड़ लाभार्थियों में वितरण के लिये ये कार्ड भेजे गए हैं और लगभग ०३.९० करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत कर दिए गए हैं।
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद यह देखा गया है कि जिस अभिप्राय (मक़सद) से यह नई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू की गई है उसे वास्तविक रूप से प्राप्त करने में (किसानों द्वारा अपने खेतों में उपयोग करने में) अभी बहुत समय लगेगा। अभी लगभग न के बराबर किसान लोग मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के आधार पर अपनी फसलों में उर्वरकों और पोषक तत्वों का प्रयोग कर रहे हैं। अभी भी बहुत से किसान हैं जिनके कार्ड तो बने हुए हैं परन्तु उन्हें इनकी उपयोगिता , उत्पादकता और आर्थिक लाभ के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। यदि है, तो भी इसे नज़र--अंदाज़ कर रहे हैं। कुछ ऐसे किसान भी हैं जिनके कार्ड बने भी हैं पर उन तक ये पहुंचे नहीं हैं और कुछ और किसान हैं जिनके साइल हेल्थ कार्ड अभी बने ही नहीं हैं।
मृदा परीक्षण कार्यक्रम कृषि विभाग की योजना में पहले भी शामिल था। अब जो इस पर इतना बल दिया गया है तो इसके परिणाम साफ़ तौर पर नज़र आने चाहियें। किसानों को उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का उपयोग इनकी सिफारिश के आधार पर ही करना चाहिए। सरकार द्वारा इस कार्यक्रम का मूल्यांकन करते रहना चाहिए, आवश्यक धन राशि का आबंटन समय पर करना चाहिए और इसे कार्यान्वयन में लाने के लिए पर्याप्त प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन प्लाट) किसान के खेत पर लगवाने चाहियें । सफल किसानों की कहानियां भी प्रसारित और प्रचारित की जानी चाहियें और परिणाम प्रत्यक्ष दिखाने चाहियें जिस से अन्य सभी किसान इस ओर प्रेरित हो सकें।
(सी.एम्.शर्मा)
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (नमसा) के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण और अत्यंत महत्त्वाकांक्षी योजना है। इस योजना का शुभारंभ १७ फरवरी २०१५ को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में किया। श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अगर किसान इसे अपना लेते हैं तो प्रति तीन एकड़ में कम से कम ५० हजार रूपये बचा सकते हैं। खेती बाड़ी का तरीका मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर होना चाहिए।
इस योजना के अंतर्गत किसानों को उनके खेतों में बोई जाने वाली फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और उर्वरकों को उपयोग करने की सलाह प्रयोगशाला में मिटटी के नमूने की जाँच के आधार पर प्राप्त नतीजे के मुताबिक ही दी जाती है, ताकि किसान अच्छी पैदावार का लाभ उठा सकें।
कृषि विभाग के अधिकारी एवं प्रचार - प्रसार कार्यकर्ता पिछले ४ वर्षों से इस विषय में किसानों को जाग्रत करते रहे हैं। अपने निजी एंड्राइड मोबाइल फोन की सहायता से उन्होंने खेतों की मिटटी के उपयुक्त नमूने अक्षांश और लोंगिट्ठे ढूंढ कर इकठा किये हैं और विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला में भी दिए। वैज्ञानिक ढंग से लाखों की संख्या में अन्य प्रांतों की तरह जम्मू कश्मीर राज्य में भी इन मिटटी के नमूनों का विश्लेषण हुआ। योजना के दिशा निर्देश अनुसार लगभग १० गुना की संख्या में किसान परिवारों के बीच इन नतीजों का ब्यौरा मृदा स्वास्थ्य कार्ड (साइल हेल्थ कार्ड्स) में दर्ज किया गया और फिर इन साइल हेल्थ कार्ड्स का वितरण भी हुआ।
विश्लेषण के द्वारा मिटटी में मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा और बोई या रोपी जाने वाली फसल में कितनी खाद और पोषक तत्वों का उपयोग करना है इसका पता भी चल जाता है । किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती है।
पहले तो सरकार का लक्ष्य सभी किसान परिवारों को ३ वर्षों में कवर करने का था परन्तु फिर इसे घटा कर २ वर्ष ही कर दिया गया। इस तरह से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का पहला चक्र २०१६--१७ में पूरा हुआ और अब दूसरा शुरू हो गया है। आशा तो बंधी है की सरकार के प्रयासों से और कृषि विषेशज्ञों के योगदान से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का अध्ययन करके एक अच्छी फसल प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।
इस योजना के अंतर्गत सरकार का प्रति २ साल के अन्दर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्ड में एक विवरण छपता है जो किसानों को अपने खेत या जमीन के लिए २ साल में एक बार दिया जाना चाहिए । इस योजना के अंतर्गत मोबाइल मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएंस्थापित करने के लिए रूपये आबंटित भी किये गये हैं, ताकि किसानों को सही परीक्षण की सुविधा मिल सके और खेतों में फसलें लहलहा सकें। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में किसी खेत विशेष की मृदा का ब्यौरा होता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में हैं और उसमें बोई गई फसलों को किस मात्रा में कौन सा उर्वरक दिया जाना चाहिए।
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के पहले दो वर्षीय चक्र (२०१५-१७) में ३१ मई २०१७ तक २.५३ करोड़ लक्षित नमूने एकत्र किये गये थे और २.२२ करोड़ (९३ प्रतिशत) नमूनों का परीक्षण किया गया था । लगभग १०.७४ करोड़ लाभार्थियों के लिये ये कार्ड भेजे गए थे और ०६.०३ करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत भी किये गए थे।
दुसरे दो वर्षीय चक्र (२०१७-१९) के लक्ष्य २.४४ करोड़ एकत्रित मृदा स्वास्थ्य कार्ड में से १.३० करोड़ नमूनों का विश्लेषण किया जा चुका है । लगभग ४.२४ करोड़ लाभार्थियों में वितरण के लिये ये कार्ड भेजे गए हैं और लगभग ०३.९० करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत कर दिए गए हैं।
इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद यह देखा गया है कि जिस अभिप्राय (मक़सद) से यह नई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू की गई है उसे वास्तविक रूप से प्राप्त करने में (किसानों द्वारा अपने खेतों में उपयोग करने में) अभी बहुत समय लगेगा। अभी लगभग न के बराबर किसान लोग मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के आधार पर अपनी फसलों में उर्वरकों और पोषक तत्वों का प्रयोग कर रहे हैं। अभी भी बहुत से किसान हैं जिनके कार्ड तो बने हुए हैं परन्तु उन्हें इनकी उपयोगिता , उत्पादकता और आर्थिक लाभ के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। यदि है, तो भी इसे नज़र--अंदाज़ कर रहे हैं। कुछ ऐसे किसान भी हैं जिनके कार्ड बने भी हैं पर उन तक ये पहुंचे नहीं हैं और कुछ और किसान हैं जिनके साइल हेल्थ कार्ड अभी बने ही नहीं हैं।
मृदा परीक्षण कार्यक्रम कृषि विभाग की योजना में पहले भी शामिल था। अब जो इस पर इतना बल दिया गया है तो इसके परिणाम साफ़ तौर पर नज़र आने चाहियें। किसानों को उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का उपयोग इनकी सिफारिश के आधार पर ही करना चाहिए। सरकार द्वारा इस कार्यक्रम का मूल्यांकन करते रहना चाहिए, आवश्यक धन राशि का आबंटन समय पर करना चाहिए और इसे कार्यान्वयन में लाने के लिए पर्याप्त प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन प्लाट) किसान के खेत पर लगवाने चाहियें । सफल किसानों की कहानियां भी प्रसारित और प्रचारित की जानी चाहियें और परिणाम प्रत्यक्ष दिखाने चाहियें जिस से अन्य सभी किसान इस ओर प्रेरित हो सकें।
(सी.एम्.शर्मा)
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