Popular Posts

शनिवार, 14 दिसंबर 2019


सोलकी--पंजाह सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत की आवश्यकता 

अभी २ दिन पूर्व मैं कालाकोट के पंजाह गाऊँ में अपने घनिष्ठ सम्बन्धी के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु गया था। वर्षा छमाछम बरस रही थी। जम्मू से राजौरी-पूंछ मुख्य मार्ग की स्थिति देख कर अच्छा लगा, परन्तु सोल्की से पंजाह की ओर घूमते ही इस ग्रामीण सड़क की स्थिति देख कर अत्यंत दुःख हुआ। टूटी और गड्ढेदार सड़क, मुसलाधार बारिश, मेटाडोर में ओवरलोड छात्र, कर्मचारी और सामान्य जनता अपनी जान को जोखिम में डाल कर यात्रा करने को मजबूर हैं। ईश्वर न कर कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो कौन उत्तरदायी होगा ? आवश्यकता है इस सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत करने की। जनता वर्षों से सरकार की ओर देख रही है। अभी आशा तो बहुत है। उम्र - रसीदा लोग कहते हैं कि यदि अभी नहीं हुआ तो फिर न जाने उनके जीते जी होगा या नहीं।     


वानर सेना का  आतंक 

पंजाह गाऊँ  में  मेरी  नज़र चारों तरफ खेतों में धड़ल्ले से घूम रहे बन्दरों के टोलों पर पड़ी। ये बन्दर खेतों में बोए हुए गेहूं के बीज निकाल-निकाल कर खा रहे थे।  किसानों ने इस विषय में कई बार प्रशासन से शिकायत की है। कोई कारगर समाधान न मिलने पर खेत के खेत लोगों ने दुखी हो कर फसल से खाली  ऱखने शुरू कर दिए हैं।

वर्ष २०१५-१६ में प्राप्त एक अनुमान के अनुसार बन्दर जम्मू संभाग में कठुआ, साम्बा, उधमपुर, जम्मू, राजौरी, रिआसी, डोडा ज़िलों के २५० से अधिक गाऊँ में लगभग १५, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर मक्का, गेहूं, धान, फल और सब्ज़ी फसलों को अत्यधिक हानि पहुंचा रहे हैं। ४, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फसलें तो बोई ही नहीं जा रहीं। तब ३३ करोड़ रूपये से अधिक का आर्थिक नुक्सान आंका गया था ।

भूख के मारे हुए जंगली पशु फलदार फसलों जैसे आम, अमरुद, नाशपाती, अंगूर, नीम्बू जाति के वृक्षों, लीची, आड़ू, आलूबुखारा, और खुबानी के अंतर्गत लगभग ६८,३८४ हेक्टेयर क्षेत्र में व्यापक नुक्सान पहुंचा रहे हैं। पंजाह गाऊँ में जो तस्वीर मैंने देखी वह बताती है कि यह नुक्सान अब कई गुणा बढ़ा होगा।

बन्दर वन्य प्राणी है और इसका सरोकार बहुधा वनों तथा वन विभाग के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों से है। इसका व्यवहार कृषि - किसानी और जम्मू जैसे मंदिरों वाले शहर में साधारण लोगों से जुड़ा हुआ है। निर्लज्ज और शरारती वानर खम्बों, तारों, गाड़ियों और घरों की छतों पर हुड़दंग मचाकर लोगों को भयभीत करते हैं। कृषि विभाग ने भी वानरों द्वारा कृषि में हो रही हानि का मुद्दा वन विभाग से उठाया है। परन्तु समाधान अभी तक नहीं मिल पाया है।

वास्तव में वानर सेना का आतंक वनों की घटती सघनता के कारण से है। वनों के बीच से गुज़रते चौड़े - चौड़े मार्ग, रेलवे पटरियों, बस्तियों, तथा कई प्रकार की कथित विकास परियोजनाओं ने इनके प्राकृतिक निवास स्थलों को  उजाड़ दिया  है। अँधा-धुंध कटते पेड़-पौधों को किसने नहीं देखा।  कुछ दशक पूर्व ऊंचे पर्वतों और पहाड़ियों पर घने जंगल होते थे परन्तु अब ये तीव्र गति से क्षीण होते जा रहे हैं। इन्हीं कारणों से मैंने स्वयं देखा है, कई स्थानों पर चश्में तथा छोटे-छोटे  नदी और नद अदृश्य होते जा रहे हैं। फलस्वरूप, मानव तथा वन-प्राणियों के बीच पानी और अन्न के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

बहुत से किसान बंदरों को नपुंसक बनाने की औषधि के उपयोग की वकालत कर रहे हैं तो कई और भी हैं जो इन्हें गोली से उड़ाने की अतिवादी आज्ञा मांगते हैं । 
कृषि विभाग तथा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सुझाव देते हैं कि किसान भाई-बहन पर्यायी फसलें जैसे अदरक, हल्दी, थोम, भिंडी, गेंदा के फूल जैसी तथा औषधीय और सुगन्धित फसलें उगाएं जो बंदरों को आकृष्ट नहीं करतीं । कृषि विभाग  इस सम्बन्ध में प्रचार - प्रसार भी कर रहा है परन्तु इन सब के लिए समुचित बीज, प्रसंस्करण और बाज़ार की सुविधाएं भी तो प्रदान करनी होंगी ।

वन विभाग और भू-संरक्षण विभाग परंपरागत जल-स्रोतों के जीर्णोद्धार और पानी को रोकने तथा संचय करने के लिए नए तालाब तथा बांधों के निर्माण की बात कर रहे हैं जिससे चश्मों में दुबारा पानी बहने लगेगा। सामाजिक वानिकी विभाग अनुपयोगी पड़े हुए क्षेत्रों तथा क्षीण हुए जंगलों को पुनर्जीवित करने के प्रयास में संलग्न है।   

स्वाभाविक है कि मानव द्वारा आमंत्रित इस आतंक से छुटकारा पाने का एक-मात्र उपाय  भी वन तथा वन्य-प्राणी विभाग, कृषि विभाग, बागबानी विभाग, शहरी तथा ग्राम विकास विभाग तथा सामान्य जनता द्वारा परस्पर सहयोग से और सूझ बूझ के आधार पर तैयार किये जाने वाली कार्य-योजना से ही संभव है। ज़मीनी स्तर पर काम काज की गुणवत्ता को पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष परिणाम दिलाने वाली रणनीति से ही लागू  करना होगा। स्थानीय जंगली फल उत्पादक वृक्ष जो पशुओं को उनकी खुराक उपलब्ध करा सकें जंगलों में व्यापक तौर पर लगाए जाने चाहियें। स्थानीय पेड़ जैसे  शीशम, पीपल, बरगद, इत्यादि जो दीर्घजीवी परन्तु लुप्तप्राय होते जा रहे हैं, उन्हें बढ़-चढ़ कर लगाया जाना चाहिए। जल संरक्षण के प्रयास  तेज़ होने चाहियें। 
(शेष फिर।  शारदा लाल, भदरवाह )