मेरे प्रलयंकर !
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
बहुत रच चुके लास्य, नेत्र अब तीजा खोलो
दुर्मति रिपु के लिए धधकती ज्वाला होलो
कांपें तीनों लोक कि बम बम बम - बम बोलो
बस, इतनी सी विनय इसे स्वीकारो शंकर !
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
जिस पर रखा तुम्हीं ने अपना सुखद वरद कर
वही लगा फैलाने कर तेरे मस्तक पर
उसी चीन के भस्मासुर पर भंक - भृकुटिशर -
मारो, चिंगी बने हिमालय का हर कंकर।
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
शिवः हे भारत ! उठो, कहाँ की है अब देरी ?
लेकर डमरू - महानाश की बाजे भेरी
कालकूट उगले प्रति गति , हर थिरकन तेरी
नाशो इन्हें कि जो बैरी तेरे, प्रलयंकर
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
(शिवरात्रि 1963)
उपरोक्त प्रार्थना हमारे स्वर्गवासी पिता श्रीमान पंडित लाल चंद जी की कुछेक संग्रहित सामग्री में से बहुमूल्य कृति है। सत्तावन वर्ष उपरान्त यह प्रार्थना आज एक बार फिर से प्रासंगिक हो गई है। आदरणीय भगवान् शंकर हमारे देश के नेतृत्व में, जनता में और सेना में अब शक्ति, सामर्थ्य और साहस का संचार करें और चीन के दुष्टों को शीघ्रातिशीघ्र भस्म कर दें, यही हमारी प्रार्थना है।
(16-06-2020)
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
बहुत रच चुके लास्य, नेत्र अब तीजा खोलो
दुर्मति रिपु के लिए धधकती ज्वाला होलो
कांपें तीनों लोक कि बम बम बम - बम बोलो
बस, इतनी सी विनय इसे स्वीकारो शंकर !
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
जिस पर रखा तुम्हीं ने अपना सुखद वरद कर
वही लगा फैलाने कर तेरे मस्तक पर
उसी चीन के भस्मासुर पर भंक - भृकुटिशर -
मारो, चिंगी बने हिमालय का हर कंकर।
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
शिवः हे भारत ! उठो, कहाँ की है अब देरी ?
लेकर डमरू - महानाश की बाजे भेरी
कालकूट उगले प्रति गति , हर थिरकन तेरी
नाशो इन्हें कि जो बैरी तेरे, प्रलयंकर
ताण्डव - नृत्य रचो, मेरे प्रलयंकर !
(शिवरात्रि 1963)
उपरोक्त प्रार्थना हमारे स्वर्गवासी पिता श्रीमान पंडित लाल चंद जी की कुछेक संग्रहित सामग्री में से बहुमूल्य कृति है। सत्तावन वर्ष उपरान्त यह प्रार्थना आज एक बार फिर से प्रासंगिक हो गई है। आदरणीय भगवान् शंकर हमारे देश के नेतृत्व में, जनता में और सेना में अब शक्ति, सामर्थ्य और साहस का संचार करें और चीन के दुष्टों को शीघ्रातिशीघ्र भस्म कर दें, यही हमारी प्रार्थना है।
(16-06-2020)
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