भारत का किसान कैसे संपन्न हो ?
सामाजिक सूचना एवं संचार माध्यम में
आजकल प्रचलित एक वीडियो में
किसान की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए सरकार
द्वारा गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर बताया गया है कि वर्ष 1970 में यह रूपये 700 प्रति
क्विंटल था जब कि 45 वर्ष उपरांत, वर्ष 2015 में, यह मात्र रूपये 1445 निर्धारित किया गया था। इसकी तुलना में सरकारी कर्मचारियों की आय, जिसमे डी. ए. इत्यादि भत्ते न शामिल करते हुए भी, 120 गुणा से लेकर 150
गुणा तक बढ़ी है। कुछ विभागों में कर्मचारियों की
आय तो इसी अवधी मे 200 गुणा से भी अधिक बढ़ी है। यह विश्लेषण स्पष्ट संकेत देता है कि किसान की स्थिति इस पूरे समय काल में शोचनीय ही हुई है। तो फिर भारतीय
किसान की आर्थिक स्थिति कैसे सुधर सकती है ? यह अत्यंत
गंभीर और संवेदन शील विषय है क्योंकि देश की आधी से कहीं अधिक जनसंख्या किसानी पर
ही निर्भर करती है। यदि यह आबादी संपन्न नहीं होती तो फिर विकास की सारी चर्चा निरर्थक ही मानी जाएगी।
मेरे विचार में इस विषय पर समग्र रूप से चिंतन करना बहुत
आवश्यक है और हाल की घोषणाओं से लगता है कि सरकार ऐसा कर भी रही है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि किसान की आर्थिक स्थिति अवश्य सुधरनी
चाहिए। यह सुधार तेज़ी से करने की आवश्यकता है। एक राय यह भी है कि केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एम एस पी) अथवा किसान से बढ़ी दरों पर अनाज की खरीद करने से ही किसान का उत्थान नहीं होगा
बल्कि इसके लिए किसान की आय के अन्य साधन भी बढ़ाने होंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि अभी
हमारे देश में खेती के उत्पाद पर्याप्त मात्रा में बेचने वाले किसान 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे । लगभग 80 प्रतिशत किसान
लघु / छोटी और मझोली श्रेणी में आते है जिन्हें अनाज
खरीदना पड़ता है। यदि उन्हें भी बाजार से मेहगे दर पर खरीद कर खाना पड़े तो वह
मुनासिब नहीं दिखता।
किसान की वास्तविक आय तभी बढ़ेगी जब कम से कम छोटे किसानों
के पास आय के वैकल्पिक साधन बढ़े । ऐसा एम नरेगा, पी एम किसान, जन धन
योजना इत्यादि के द्वारा सीमित सतर पर हो भी रहा है, परंतु
बहुत से अन्य उपाय भी ज़रूरी है जैसे गरीबों, मजदूरों,
सीमांत और लघु किसानों को सब्सिडी पर राशन उपलब्ध कराना, कृषि में न्यायसंगत विविधीकरण लाना, इत्यादि । गांव में
कृषि एवं अन्य साधनों पर आधारित छोटे मोटे उद्योग धंधों की स्थापना
करना। रोज़गार के साधन भी बढ़ने चाहिए। इसलिए निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगपतियों/ पूंजीपतियों और योग्य दाताओं का अत्यधिक मुनाफा किसान - मज़दूरों, विशेष रूप में लघु और मझोले किसानों के हित में जुटाने एवं स्थानांतरित करने के लिए सरकार द्वारा माध्यम तथा दीर्घ अवधि वाली 'किसान विकास पत्र' अथवा 'किसान समर्थक कोष' जैसी योजनाओं को स्थापित एवं सुदृढ़ करने वाली योजना चलाने पर विचार करना चाहिए।
जनसंख्या वृद्धि से आयदिन किसान के पास जमीन घटती और कटती जा रही है
जहां न तो मशीनरी का उपयोग हो सकता है, न जलसंसाधन पर्याप्त रूप से उपयोग में लाये
जा सकते हैं, न लागत कम हो सकती है, न
उत्पादन बढ़ सकता है और न ही आमदन बढ़ सकती है ।
इसीलिए इस समस्या को ध्यान में रखते हुए उपाय के रूप में और
जोत की उपलब्धता कों आर्थिक दृष्टि से वायबल रखने के लिए, किसान
उत्पादक संघ/एफपी ओ/ सेल्फ हेल्प ग्रुप/कॉन्ट्रैक्ट
फार्मिंग, इत्यादि की बात भी की जाती है । परंतु ये संगठन
तभी सफल हो सकते है जब इनके सदस्य एकमत हों, एक लक्ष्य हो,
एक दूसरे के विश्वासपात्र हों, और अपने
सदस्यों के प्रति कर्तव्य बोध से ओतप्रोत हों । इसके लिए ईमानदारी का जज्बा होना और
पोस्ट हार्वेस्ट प्रबंधन, गुणवत्ता, तथा
बैंक और बाजार व्यवस्था के बारे में प्रशिक्षित होना भी जरूरी है । गांव में ऐसा
होना कोई मुश्किल नहीं है लेकिन नवयुवकों को विशेष रूप से इस दिशा में तैयार करने
की जरूरत है ।
कोविड -19 के बाद का भारत कृषि के आधार पर ही आगे बढ़ेगा, ऐसा
साफ प्रतीत हो रहा है ।यह ज़रूर है कि सरकार द्वारा कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र के बीच हर तरह का
संतुलन बिठाना पड़ेगा । ऋण सुविधा और फसल बीमा योजना को भी अधिक तर्कसंगत और
किसानों के लिए आकर्षक और ग्राहय बनाना होगा ।
भारत के सतत और टिकाऊ विकास के लिए यह एक आदर्श स्थिति होगी यदि आय के लिए सीधे तौर से खेती पर केवल 35-40
प्रतिशत जनता ही निर्भर हो तथा शेष 60-65
प्रतिशत जनसंख्या उद्योग और सेवा क्षेत्र
में रोज़गार पाएं। युवा शक्ति का आकर्षण गाओं की ओर रहना चाहिए। शहर का आकर्षण इन्हें अस्थिर एवं अधिक पराश्रित बनाता है।
लगता है कि सरकार के प्रयास शुद्ध और ईमानदार हैं परंतु कुछ समय से और भी
बहुत सारी दिशाओं से आ रहे संकट चुनौती दे रहे हैं । आजकल हम में से ही कई लोग कहते हैं कि जवान और किसान एक
समान परिश्रम करते हैं तो किसानों को उनके समान
पारिश्रमिक क्यों नहीं ? मेरे विचार में हम में से ही जो जवान जिन परिस्थिति और जिस उद्देश्य से सीमा पर तैनात और सेवारत हैं उनकी निर्धारित आय से किसी की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं
होना चाहिए। ये जवान विपरीत परिस्थिति में कष्ट सहते हैं, रातों को जागते हैं, मृत्यु को ललकारते हैं ताकि उनके देशवासी शत्रु के षड्यंत्रों और आक्रमणों
से सुरक्षित रहें।
निश्चय ही आज के भूमिहीन, लघु,
मध्यम और अन्य साधन हीन किसान और मजदूर
की आर्थिक स्थिति भी गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए
सरकार द्वारा सही नीति और इस नीति का सही कार्यान्वयन आवश्यक है । किसी वाजिब स्तर तक न्यूनतम
समर्थन मूल्य में वृद्धि किसान को सम्पन्न बनाने की दिशा में एक कदम अवश्य है परन्तु यह काफी नहीं है । इसके अतिरिक्त भी बहुत से प्रयास करने की आवश्यकता
है। अपनी ओर से किसानों को भी स्वयं की भौतिक
तथा आर्थिक उत्पादकता सतत बढ़ाने के लिए सार्थक रूप से संगठित और प्रयासरत होना पड़ेगा। यह कार्य तो देशवासियों ने ही करना है - अपने घर
में, गांव में, अपनी पंचायत में,
जिले में, प्रांत में और देश में।
नेशन फर्स्ट/ सर्वप्रथम राष्ट्र !
- सी एम शर्मा
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें