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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

aazaadii

आज़ादी 

माना अब आज़ाद हैं हम, आज़ादी हमको प्यारी है,
जल, थल और आकाश में उड़ने की अभिलाषा न्यारी है।

सुन्दर घर है हम सब का, चाहे कुटिया, महल, अटारी है,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर पर श्रद्धा सबकी सारी है।

लेकिन फिर भी कोई मनचला ठेस हमें पहुंचाता है,
प्रेम और विश्वास के आँगन में हड़कंप मचाता है।

विचलित होकर धैर्य सिहरता, जग जाता मन में अज्ञान,
अगले पल सुमिरन हो आता "स्वत्व, आस्था और स्वाभिमान।"

दिल में जागृत हो जाती है मानवता की शाश्वत रीत,,
कैसे भूलें हदों की रक्षा, जब हम बाँटें घर-घर में प्रीत।

अपनी फुलवारी को काँटों के ज़ख्मों से बचाना है,
निर्बल को दे अभय-दान, निज घर को स्वर्ग बनाना है।

याद रखो है नींव देश की आदर, श्रद्धा और सम्मान,
चार-दीवारी है निष्ठा की, आस्था का है यह निर्माण।

बल-पौरुष, शिक्षा की छत से रखें सुरक्षित घर परिवार,
हिल-मिल कर जीने-मरने का कायम रहे सुहृद व्यवहार।

सुखी और संपन्न हो जन-जन, सफर नहीं है यह आसान,
नमन हमारा उनको जो तन, मन, धन का करते बलिदान।।

शारदा लाल (२६-०२-२००७)






 

रविवार, 11 नवंबर 2018

माँ के बेटे

माँ के बेटे

वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।
मिटा कर अपनी हस्ती को वतन की शान बढ़ाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमारे कल की चिंता उनके दिल की धड़कनों में है,
वतन के माँ, बहिन, बेटी की रक्षा उनका जीवन है।
इसी के वास्ते वे मौत से लड़ने को जाते हैं,
समर्पण अपना जीवन कर हमें जीवन दिलाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमें दे जीत का उपहार सेना कर रही उपकार,
अपना फ़र्ज़ हम समझें करें दृढ देश का आधार।
मेहनत हो कड़ी खेतों, स्कूलों, कारखानों में,
बढ़ा दें चौकसी सीमा के अंदर और सरहद पे ।।
सिपाही की विरासत की सुरक्षा, मान हो निश्चित,
तभी ज़िंदा रहेगा हिन्द, ज़िंदा हर जवान होगा।
इसी के वास्ते रणबांकुरे सम्मान पाते हैं,
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।   

गुरुवार, 16 अगस्त 2018


 
अटल सन्देश - अटल जी के नाम 
 
ऐ गीतकारयुग शिल्पकार ! अब गीत सृजन के नए बुनो तुम,
मानव का कवि-मन जागे, मानवता का गुण-गान करो तुम।
द्वार दिलों के वे खोलो जो घृणा-द्वेष को मिटा सकें,
वे छंद लिखो जो मानवता की मर्यादा का मान रख सकें। 
रीत प्रीत की, गूँज गीत की, अस्त्र-शस्त्र ,से ताकतवर है,
बंटवारे की सीमा तोड़ें, ह्रदय के उद्गारों में बल है।
गीत दिलों को जोड़ लेते हैं, गीत ह्रदय के भ्रमर का गुंजन,
गीत ह्रदय से जो उपजें, वे गीत ऊसर को करते मधुबन 
गीत होंठ पर जब है आते, कहाँ छिपे रहते फिर राज़,
पत्थर जैसे भारी दिल भी, लेते हैं लम्बी परवाज़।
फ़ख़र नहीं है किसे इस दिल पर, निज दिल पर न किसे है नाज़,
ये सब हैं दिल की बातें और हर एक दिल में कई महाज़।
दिल में जंग के बादल भी हैं, प्यार के सागर भी हैं दिल में,
तोड़ें जो दीवारें दिल की, रस के भरे गीत दिल में हैं।
फ़ख़र हमें इन गीतों पर है, गीतों की भावुकता पर है,
जिस संस्कृति में संत रमे हैं, उनके वचनों-कर्मों पर है। 
नानक, गौतम संत यहां हैं, वाल्मीकि, चैतन्य, जनक, हैं,
मीरा औ' रहीम तुल्य भी, "मदर  टेरेसा जैसे धनक हैं।
कर्म हमारी रग-रग में है, कृष्ण हमारे गीतों में हैं,
राम प्रेरणा स्रोत हमारे, शिव-शंकर हर कण-कण में हैं। 
 
त्याग भावना ने हम सब को, सहन-शक्तियुत सबल किया है,
प्रेम और सद्भाव की खातिर खून का हमने दान दिया है।
फिर भी यदा - कदा कैकेई की मति नियति ने फेरी है,
उसे पता क्या राम - भारत के बीच नहीं कोई दूरी है!
जुदा हुए परिवार तो क्या, अब भी संधि का मौका है,
जो हैं भटके और क्षुब्ध हुए हैं, मिलें तो फिर किसने रोका है?
छोड़ चुके जो हाथ मिलाना द्वेष छोड़ वे होश में आएं,
मानवता की खुली डगर पर प्रेम के जग-मग दीप जलाएं।
आज  मिलन की  बेला है, अब मन-तरंग का ज़ोर दिखाओ,
ऐ कविमन नेतृत्व दिखाओ, "खून से बिछड़ा खून मिलाओ!
खून से बिछड़ा खून मिलाओ!! खून से बिछड़ा खून मिलाओ!!
 _____(शारदा लाल, भद्रवाह। यह कविता मैंने तब लिखी जब अटल बिहारी वाजपेयी जी मित्रता का हाथ बढ़ाने भारत के प्रधान मंत्री के रूप में पकिस्तान के लाहौर शहर पहुंचे थे। हमें अभी भी यह आशा है कि वाजपेयी जी का यह मिशन, जो सभी सकारात्मक सोच रखने वाले भारतीयों और पाकिस्तानियों का प्रतिनिधित्व करता है शीघ्र ही सफल होगा । हमारी अंतरआत्मा से वाजपेयी जी और उनकी सोच को श्रद्धापूर्वक नमन!)
 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता आंदोलन के कारकों को भी याद करें

(शारदा लाल, भद्रवाह )

यह कैसी विडंबना है कि जो उद्देश्य और प्रेरणा स्रोत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारक बने, स्वतंत्र भारत के बहुत से नागरिक आज उन्हें तुच्छ समझने लगे हैं।  मंगल पांडे और उनके सहयोगियों ने अपने जीवन की आहुति इस लिए दी की उन्हें अंग्रेजी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का शक था। अपनी संस्कृति और धर्म को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने ऐसे कारतूस को मुंह लगाने के बदले अपने प्राण न्योछावर कर देना श्रेयस्कर समझा ।

भारत एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) देश है। इसका अर्थ यह नहीं की यहां के नागरिक धर्म को नहीं मानते। वास्तविक बात तो यह है कि यहां की जनता धार्मिक प्रवृति की है। धार्मिक होना अच्छी बात है परन्तु साथ में यह भी ध्यान रखने की बात है कि सभी लोग एक-दुसरे की धार्मिक भावनाओं का आदर करना अपना कर्त्तव्य समझें। सेकुलरिज्म का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं धार्मिक होते हुए कोई ऐसी बात या ऐसा काम न करे जिससे दूसरे की धार्मिक भावनायें आहत हों । जिस गाय को एक व्यक्ति माता कहता है उसका यदि कोई वध करे तो ऐसी व्यवस्था से गौमाता कहने वाले का निराश होना स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में गौहत्या बंद करने की ओर कदम उठाना निहित है। तो फिर इसे यथा-शीघ्र बंद कर ही देना उचित है। लेकिन इस काम में सभी सरकारों  को समझदारी से यथाशीघ्र कदम उठाने चाहियें। सरकारों द्वारा बहस में उलझने के बदले हर तरह की हिंसा रोकने के लिए कारगर कदम उठाने चाहियें।

दूसरी ओर क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए की शहीद अशफाकुल्लाह खान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, शहीद हवलदार अब्दुल हमीद, आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान शाहनवाज़ खान, सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अभिनेता दलीप कुमार और असंख्य मुस्लिम समुदाय के व्यक्तित्व भारत के लिए बेजोड़ काम करते गए और इसे समृद्ध बनाते गए। भारतवर्ष तभी एक सशक्त एवं समृद्ध राज्य बन सकता है जब हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, इत्यादि अपने धर्म, त्यौहार ख़ुशी से मना सकें, हिंसा - घृणा का त्याग करें, विकास के प्रयास करें और विकास के लाभ का मिल बाँट कर उपभोग करें।

यह भारत देश ही है जहाँ की सम्पन्नता की बातें सुन कर विदेशों लोग किसी न किसी कारण से यहां आते रहे हैं। अमेरिका की खोज तो कोलंबस ने सन्न १४९२ में आज से केवल ५२५ वर्ष पूर्व ही की थी परन्तु भारत में आने वाले विदेशी हज़ारों वर्षों से कभी तो आक्रामक बन कर आये, कभी शरणार्थी, कभी ज्ञान वर्धन के लिए और कभी व्यापारी बनकर।

कहा तो यह भी जाता है कि आर्य लोग भारत में आज से लगभग ३५०० वर्ष पूर्व आये जो की अभी विवादास्पद है। ग्रीस के शासक सिकंदर महान और सेलुकस निकाटोर (ईसा से ३२६ से ३२४ वर्ष पूर्व),  इतिहासकार मैगेस्थनीज़ ( ३०२ से २९८ वर्ष पूर्व ), कुषाण, इत्यादि (ईसा से २०० वर्ष पूर्व से लेकर सन्न ३०० ईस्वी तक), हुन पांचवीं और छठी शताब्दी के बीच आक्रमण करते रहे और यहां की संस्कृति में ढलते गए। फ हैं (३९९ से ४१२ ईस्वी), हिउएन तसंग (६२९ से ६४५ ईस्वी), अल बेरुनी (१००० से १०२५ ईस्वी), मार्को-पोलो (१२५४ से १३२४ ईस्वी) ज्ञान वर्धन एवं सैलानी के रूप में भारत आये। अरब से मोहम्मद बिन क़ासिम ने ७१२ ईस्वी में सिंध पर आक्रमण किया। मोहम्मद ग़ज़नी ने १००० ईस्वी में आकर लूट--पाट की और वापिस चले गया। यह मोहम्मद गौरी था जिसने ११९४ ईस्वी में आक्रमण के बाद दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया। उसने भारत की संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का सिक्का जमाना शुरू किया जो तैमूर (१३९८ ईस्वी) के आक्रमण और फिर मुग़ल साम्राज्य की १५२६ ईस्वी में स्थापना के पश्चात बढ़ता ही गया। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली का क्रूर आक्रमण १७३९ से १७६७ ईस्वी के बीच भारत पर हुआ जिसमे कई लोग मारे गए और सम्पति को भारी नुक्सान हुआ।

पुर्तगाल से अल्फोंसो दे अल्बुकर ने गोवा पर १५१० ईस्वी में अपना अधिपत्य जमाया। इस बीच फ्रेंच, डच, डेन भी आये जिनका मक़सद मुख्यता व्यापार था। वर्ष १७५७ के उपरांत अँगरेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की शकल में और फिर ब्रिटिश साम्राज्य की शकल में पूरे भारतवर्ष पर पहले तो व्यापार के लिए और फिर शासन (कु :शासन ) के लिए स्थापित हो गए। अशोक चौरे (२०१७) के एक सादा और न्यूनतम अनुमान के अनुसार लगभग दो शताब्दी के अपने शासनकाल में अंग्रेज़ों ने भारत से ६०० ट्रिलियन पौंड की लूट और चोरी की जिसे भारत को लौटाया जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने १८७० के दशक में लिखी हुई अपनी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" में सन्न १८५७ उपरांत के अनुमान से प्रति वर्ष ४ मिलियन पौंड की लूट बताई थी। इस समय से पूर्व की लूट २ मिलियन पौंड प्रति वर्ष आंकी गई है और इसमें ७.५ प्रतिशत कम्पौंड इंटरेस्ट भी शामिल किया गया है।


अँगरेज़ पहले तो देश के मुस्लिम नवाबों और शासकों के विरुद्ध लड़ते रहे और फिर पैंतरा बदल कर हिन्दू शासकों के विरुद्ध दमनकारी चालें चलते रहे। अंत में उन्होंने दोनों पक्षों को आपस में लड़ने के लिए असहिष्णुता और अनादर का तरीका निकाला और भारतवर्ष को १४/१५ अगस्त १९४७ के दिन आज़ादी देकर दो देशों हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बाँट दिया। १९७१ में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की लगातार बढ़ती हुई हठधर्मी के कारण पाकिस्तान भी टूटा और बांग्लादेश बना। अभी भी अंग्रेज़ों ने अपने सामरिक और व्यापारिक अधिपत्य को बनाये रखने के लिए इस उप-महाद्वीप में "फुट डालो और राज्य करो" की नीति नहीं छोड़ी है।

भारत का संविधान जो कि शक्ति और हिम्मत, शांति और सत्य, निरंतर विकास, समानता, धर्म के आदर और समरसता का वाहक है और सामाजिक न्याय का प्रतीक है, उसे सच्ची निष्ठा से लागू करने से ही निर्धन, शोषित, दलित, और कमज़ोर वर्ग का कल्याण हो सकता है। संपन्न वर्ग को स्वेच्छा से कुछ त्याग के लिए भी तैयार रहना चाहिए। तर्कसंगत टेक्स प्रणाली, आरक्षण सुविधा और प्रत्येक मनुष्य के जान-माल और सम्मान की सुरक्षा कानूनी और सामाजिक तौर पर इस तरह से सुनिश्चित होनी चाहिए कि वह भारतीयता में स्वयं को पूरी तरह भागीदार समझे, भारतीयता में अपनी सुरक्षा समझे और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहे। इस मार्ग में सरकार का दायित्व बहुत बड़ा है। कानून का राज्य स्थापित करना आवश्यक है। चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और खर्चे पर अंकुश, करप्शन को हटाना, ग्रामीण विकास और निराश्रितों को आश्रय देना स्वतंत्र भारत की अभी भी बहुत बड़ी चुनौती है। कानून का उल्लंघन करने वालों को समझा-बुझा कर और दंड दे कर क़ानून के दायरे में लाना होगा और पालन करने वाले को मान-सम्मान देना होगा। राजनीतिज्ञों और सरकारी अफसरशाहों का इस ओर उन्मुखीकरण परम आवश्यक है तभी भारत में सुराज और सुशासन स्थापित होगा।

 

शनिवार, 28 जुलाई 2018

अब आवश्यक है मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित  सिफारिशों पर उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का फसलों में उपयोग करना  

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (नमसा) के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण और  अत्यंत महत्त्वाकांक्षी योजना है। इस योजना का शुभारंभ १७ फरवरी २०१५ को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में किया। श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अगर किसान इसे अपना लेते हैं तो प्रति तीन एकड़ में कम से कम ५० हजार रूपये  बचा सकते हैं। खेती बाड़ी का तरीका मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर होना चाहिए।

इस योजना के अंतर्गत किसानों को उनके खेतों में बोई जाने वाली फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और उर्वरकों को उपयोग करने की सलाह प्रयोगशाला में मिटटी के नमूने की जाँच के आधार पर प्राप्त नतीजे के मुताबिक ही दी जाती है, ताकि किसान अच्छी पैदावार का लाभ उठा सकें।

कृषि विभाग के अधिकारी एवं प्रचार - प्रसार कार्यकर्ता पिछले ४ वर्षों से इस विषय में किसानों को जाग्रत करते रहे हैं।  अपने निजी एंड्राइड मोबाइल फोन की सहायता से उन्होंने खेतों की मिटटी के उपयुक्त नमूने अक्षांश और लोंगिट्ठे ढूंढ कर इकठा किये हैं और विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला में भी दिए। वैज्ञानिक ढंग से लाखों की संख्या में अन्य प्रांतों की तरह जम्मू कश्मीर राज्य में भी इन मिटटी के नमूनों का विश्लेषण हुआ। योजना के दिशा निर्देश अनुसार लगभग १० गुना की संख्या में किसान परिवारों के बीच इन  नतीजों  का ब्यौरा मृदा स्वास्थ्य कार्ड (साइल हेल्थ कार्ड्स) में दर्ज किया गया और फिर इन साइल हेल्थ कार्ड्स का वितरण भी हुआ।

विश्लेषण के द्वारा मिटटी में मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा  और बोई या रोपी जाने वाली फसल में कितनी खाद और पोषक तत्वों का उपयोग करना है इसका पता भी चल जाता है ।  किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती है।

पहले तो सरकार का लक्ष्य सभी किसान परिवारों को ३ वर्षों में कवर करने का था परन्तु फिर इसे घटा कर २ वर्ष ही कर दिया गया।  इस तरह से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना  का पहला चक्र २०१६--१७ में पूरा हुआ और अब दूसरा शुरू हो गया है।  आशा तो बंधी है की सरकार के प्रयासों से और कृषि विषेशज्ञों के योगदान  से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का अध्ययन करके एक अच्छी फसल प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

इस योजना के अंतर्गत सरकार का प्रति २ साल के अन्दर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्ड में एक विवरण छपता है जो किसानों को अपने खेत या जमीन के लिए २ साल में एक बार दिया जाना चाहिए । इस योजना के अंतर्गत मोबाइल मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएंस्थापित करने के लिए रूपये आबंटित भी किये गये हैं, ताकि किसानों को सही परीक्षण की सुविधा मिल सके और खेतों में फसलें लहलहा सकें। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में किसी खेत विशेष की मृदा का ब्यौरा होता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में हैं और उसमें बोई गई फसलों को किस मात्रा में कौन सा उर्वरक दिया जाना चाहिए।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के पहले दो वर्षीय चक्र (२०१५-१७) में ३१ मई २०१७  तक २.५३ करोड़ लक्षित नमूने एकत्र किये गये थे और २.२२ करोड़ (९३  प्रतिशत) नमूनों का परीक्षण किया गया था । लगभग १०.७४ करोड़ लाभार्थियों के लिये ये कार्ड भेजे गए थे और ०६.०३ करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत भी किये गए थे। 

दुसरे दो वर्षीय चक्र (२०१७-१९) के लक्ष्य २.४४ करोड़ एकत्रित मृदा स्वास्थ्य कार्ड में से १.३० करोड़ नमूनों का विश्लेषण किया जा चुका है ।  लगभग ४.२४ करोड़ लाभार्थियों में वितरण के लिये ये कार्ड भेजे गए हैं और लगभग ०३.९० करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत कर दिए गए हैं।

इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद यह देखा गया है कि जिस अभिप्राय (मक़सद) से यह नई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू की गई है उसे वास्तविक रूप से प्राप्त करने  में (किसानों द्वारा अपने खेतों में उपयोग करने में) अभी बहुत समय लगेगा। अभी लगभग न के बराबर किसान लोग मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के आधार पर अपनी फसलों में उर्वरकों और पोषक तत्वों का प्रयोग कर रहे हैं। अभी भी बहुत से किसान हैं जिनके कार्ड तो बने हुए हैं परन्तु उन्हें इनकी उपयोगिता , उत्पादकता और आर्थिक लाभ के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। यदि है, तो भी इसे नज़र--अंदाज़ कर रहे हैं। कुछ ऐसे किसान भी हैं जिनके कार्ड बने भी हैं पर उन तक ये पहुंचे नहीं हैं और कुछ और किसान हैं जिनके साइल हेल्थ कार्ड अभी बने ही नहीं हैं।

मृदा परीक्षण कार्यक्रम कृषि विभाग की योजना में पहले भी शामिल था।  अब जो इस पर इतना बल दिया गया है तो इसके परिणाम साफ़ तौर पर नज़र आने चाहियें। किसानों को उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का उपयोग इनकी सिफारिश के आधार पर ही करना चाहिए। सरकार द्वारा इस कार्यक्रम का मूल्यांकन करते रहना चाहिए, आवश्यक धन राशि का आबंटन समय पर करना चाहिए और इसे कार्यान्वयन में लाने के लिए पर्याप्त प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन प्लाट) किसान के खेत पर लगवाने चाहियें । सफल किसानों की कहानियां भी प्रसारित और प्रचारित की जानी चाहियें और परिणाम प्रत्यक्ष दिखाने चाहियें जिस से अन्य सभी किसान इस ओर प्रेरित हो सकें।

(सी.एम्.शर्मा)

गुरुवार, 26 जुलाई 2018


 
 सभ्य समाज का परिचय दें: प्रदूषण को न्यूनतम और हरियाली को अधिकतम रखें। 
 
 हिमालय से स्थिर पर्वत अपनी चोटियां और दामन कटा कर, पेड़-पौधे अपना अस्तित्व मिटा कर, खेत-खलिहान अपना व्यास घटा कर बढ़ती हुई जनसँख्या के लिए विकास की बलिवेदी पर हमारी आने वाली संतानों के लिए स्वयं को लुटा रहे हैं और हम खुश हो कर यह कीमत देने के लिए तैयार हैं, इस बात से अनभिज्ञ की कि हम परमात्मा के वरदान को तुच्छ समझ कर ठुकरा रहे हैं और असंतुलित तोड़-जोड़ को उन्नति कह रहे हैं।
 
अमेरिका, चीन, जापान, जैसे विश्व के तथाकथित बड़े-बड़े देशों की नक़ल करते हुए हमने भी बड़ी-बड़ी सड़कें, पुल, बहुमंज़िला इमारतें, बाजार और न जाने क्या-क्या बनाना शुरू किया है। परन्तु जम्मू शहर से अखनूर की तरफ जाने वाली दो लाइन वाली सड़क का चार लाइन की सड़क में परिवर्तित होने वाले काम की शुरुआत में कुर्बान होते हुए असंख्य विशालकाय सायादार और सूंदर पेड़ों को देख कर मन में जो दुःख हुआ, वह कहा नहीं जा सकता। कुछ पेड़ इनमे सड़क की ओर ज़्यादा झुके हुए थे और आंधी तूफ़ान में घातक भी हो सकते थे परन्तु शेष तो हरे, फूलवाले और मनमोहक थे। माना कि विकास-यात्रा में ये बाधक थे परन्तु प्रकृति-प्रेमियों को इनकी कमी तो खलती रहेगी। बहुत से लोग यह भी पूछ रहे हैं की क्या सरकार के पास इनकी भरपाई करने का कोई प्रोग्राम भी है या फिर निरीह जनता को खुली धुप और वर्षा के सहारे छोड़ दिया जाएगा। अभी बहुत से सरकारी काम्प्लेक्स जम्मू में बने हुए हैं जहाँ खुली जगह भी  है, पेड़-पौधे भी हैं लेकिन देख भाल के आभाव में वे या तो वे गल-सड़ रहे हैं या भेद-बकरी की भेंट हो रहे हैं। 
 
पिछले दिनों पर्यावरण, बाल एवं महिला विकास, शिक्षा एवं कृषि को समर्पित संसथान "समीक्षा" के एक प्रतिनिधि मंडल ने जिसकी अध्यक्षता श्री अजय खजुरिआ (पूर्व डी.सी) कर रहे थे, इस विषय में जम्मू के संभाग आयुक्त श्री संजीव वर्मा से बात-चीत की। प्रतिनिधिमंडल में सरकारी सेवा से निवृत्त हुए प्रमुख व्यक्ति मेंबर के रूप में शामिल थे सर्व श्री जिया लाल शर्मा (पूर्व बागबानी निदेशक), विनोद मल्होत्रा (शहर नियोजक), सी.एम्.शर्मा (कृषि विशेषज्ञ), करतार सिंह (पूर्व तहसीलदार), रोहित खजुरिअ (वित्त विशेषज्ञ) और सुभाष अन्तल (प्रशासन विशेषज्ञ)। प्रतिनिधिमंडल का कहना था कि इस चार लाइन वाली सड़क को बनाते समय रणबीर नहर और सड़क के दरमियान पर्याप्त हरित क्षेत्र, गंदी शहरी नालियों के निकास, बिजली की तारों, पानी की पाइपों, टेलीफोन की तारों, गाड़ियों के रुकने के स्थानों और सर्विस सड़कों की सुचारु व्यवस्था समेकित ढंग में पहले से ही की जानी चाहिए। श्री विनोद मल्होत्रा ने ध्यान आकर्षित करते हुए कहा कि जम्मू - अखनूर सड़क  के साथ साथ बहती हुई रणबीर नहर देश भर में बर्फ से ठन्डे पानी वाली एकमात्र नहर है जो पिछले ११५ वर्ष से वास्तव में जम्मू की जीवन रेखा बनी हुई है परन्तु आज फैलते हुए जम्मू शहर के दबाव में घुटन और प्रदूषण के कगार पर है।  यदि इस के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान न दिया गया तो वह दिन दूर नहीं जब यह एक गंदे नाले में परिवर्तित हो जाएगी और जम्मू की धरोहर लुप्त हो जाएगी। यह भी आग्रह किया गया कि रणबीर नहर सिंचाई और पण-बिजली परियोजना के साथ साथ सैलानियों के मनोरंजन के लिए विशेष दर्जा प्ऱप्त कर सकती है बशर्ते इसका सुधार एवं प्रबंधन स्मार्ट सिटी के अनुरूप योजनाबद्ध और एकीकृत तरीके से हो। इसमें समीक्षा ने अपनी ओर से पूरे सहयोग और वांछित सेवा का आश्वासन दिया। श्री संजीव वर्मा (आई.ऐ.एस.) ने संस्था के सुझाव और चिंताओं का पूरा संज्ञान लिया। उन्होंने जम्मू डेवलपमेंट अथॉरिटी के वाईस चेयरमैन श्री अरविन्द कोतवाल और सड़क निर्माण के लिए नियुक्त संसथान के जनरल मैनेजर श्री विजय को समीक्षा द्वारा उठाए गए मुद्दों को ध्यान में रखने के लिए निर्देश दिए और आश्वासन भी दिया की समीक्षा सोसाइटी द्वारा उठाए गए सभी विचारयुक्त मुद्दे यथासम्भव तरीके से संज्ञान में लिए जाएंगे।
अपनी तरफ से समीक्षा संसथान ने इस सप्ताह जम्मू क्षेत्र को हरा भरा रखने के उद्देश्य से एक वृक्षारोपण अभियान मुठी स्थित जम्मू रूरल डेवलपमेंट सोसाइटी के अध्यक्ष, डॉ. कुलभूषण शर्माके सहयोग से चलाया। इसमें सामाजिक वनयिकी विभाग जम्मू के सौजन्य से बिलपत्री, बरगद, पीपल, जामुन, टीकौमा और गुलमोहर के लगभग ५० पौधे संग्रामपुर पंचायत में टिकरी खेनि की शमशान भूमि और भगवन काली बीर के मंदिर के सामने कम्युनिटी हॉल के प्रांगण में रोपे गए। अभियान में श्री अजय खजुरिअ, डॉ. यु.के.मेहता (उपाध्यक्ष समीक्षा), सर्व श्री जिया लाल शर्मा, सी.एम्.शर्मा, रोहित खजुरिआ, सुभाष अन्तल, संग्रामपुर पंचायत के पूर्व सरपंच श्री अश्वनी शर्मा, दुर्गो चक के पूर्व पांच श्री मंगल दस्, और गाओं के प्रमुख नागरिकों सर्व श्री शाम लाल, रवि दत्त, रमेश कुमार, दीपक कुमार, सुभाष शर्मा, ने कार्यक्रम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। सभी उपस्थित स्वयं सेवकों ने ऐसा अभियान जारी रखने और पौधों की हिफाज़त करने की प्रतिज्ञा भी ली। इस अवसर पर वहां बिखरे पड़े प्रदूषण फैला रहे प्लास्टिक और पॉलिथीन के चीथड़े भी इकठा किये गए। समीक्षा द्वारा विश्व पर्यावरण दिवस (५ जून २०१८ ) को बीट प्लास्टिक पोल्लुशण के नाम से जो अभियान साम्बा जिला के उत्तरबेहनी देवस्थान से छेड़ा गया था यह उसी की पुनरावृति थी।
हमें आशा है कि विकास की आवश्यकताओं को पूरा करते समय हम लोग एक सभ्य समाज का परिचय देते हुए प्रदूषण को न्यूनतम स्तर पर लाने का पूरा प्रयास हर स्तर पर हर स्थान पर और हर समय पर करेंगे। अपनी अनमोल संस्कृति और धरोहर को देश की सम्पदा के रूप में संजो कर रखेंगे और हरियाली को छोटे से ले कर बड़े, प्रत्येक प्राणी के लिए पर्याप्त मात्रा में बढ़ते रहेंगे। वर्षा ऋतु इस के लिए उपयुक्त समय है।
                                                            (सी.एम्.शर्मा )

सोमवार, 16 जुलाई 2018

उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।

उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
संसार से ऋण मुक्त हो कर मै, ..........
नयनों के सागर  को देखूंगा, ........
न जानोगी मैं कितना हार्दिक कृतकृत्य हूँगा!!

सर्प सी लिपटी जटाएं
जब गगन को ढांप लेंगी।
सर्प सी लिपटी जटाएं जब गगन को ढांप लेंगी ,
बादलों की उस निराली चाल पर मैं मुग्ध हूँगा।।.....

जिनके पर्दे से छिटकती ...
चांदनी विश्राम देगी।
जिनके पर्दे से छिटकती चांदनी विश्राम देगी,
वर्षों से प्यासे पथिक को सौम्यता का पान देगी।।

आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ ,
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।।

कुछ क्षणों में आ रही
आंधी का अब आभास भी है,
कुछ क्षणों में आ रही आंधी का अब आभास भी है,
जो उड़ा लेगी लटें और शांत मुख होगा प्रदर्शित।।

फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे,
कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?
फिर कहाँ तुम मुझको देखोगे, कहाँ मैं तुम को देखूंगा ?,
मैं उसकी गोद में ऋण मुक्त होकर, एक नया संसार देखूंगा।।

न जानोगी वही पल.. 
जन्म-जन्मों के सबर का....
न जानोगी वही पल, जन्म-जन्मों के सबर का,
धैर्य का, संतोष का, संघर्ष का उत्सर्ग होगा।।

आज मैं उस चांदनी के
भव्य दर्शन को विकल हूँ।
आज मैं उस चांदनी के भव्य दर्शन को विकल हूँ।
प्राण में जो चेतना दे, उस सुधा रस को विकल हूँ।। 
 
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में,
उन क्षणों में जब तुम्हारी गोद में।।