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बुधवार, 3 जून 2020


भारत का किसान कैसे संपन्न हो ?

सामाजिक सूचना एवं संचार माध्यम में आजकल प्रचलित एक वीडियो में किसान की आर्थिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए सरकार द्वारा   गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर बताया गया है कि वर्ष 1970 में यह रूपये 700 प्रति क्विंटल था जब कि  45 वर्ष उपरांत, वर्ष 2015 में, यह मात्र रूपये 1445 निर्धारित किया गया था।  इसकी तुलना में सरकारी कर्मचारियों की आय, जिसमे डी. ए. इत्यादि भत्ते न शामिल करते हुए भी, 120 गुणा से लेकर 150 गुणा तक बढ़ी है। कुछ विभागों में कर्मचारियों की आय तो इसी अवधी मे 200 गुणा से भी अधिक बढ़ी है। यह विश्लेषण स्पष्ट संकेत देता है कि किसान की स्थिति इस पूरे समय काल में शोचनीय ही हुई है। तो फिर भारतीय किसान की आर्थिक स्थिति कैसे सुधर सकती है ? यह अत्यंत गंभीर और संवेदन शील विषय है क्योंकि देश की आधी से कहीं अधिक जनसंख्या किसानी पर ही निर्भर करती है।  यदि यह आबादी संपन्न नहीं होती तो फिर विकास की सारी चर्चा निरर्थक ही मानी जाएगी। 

मेरे विचार में इस विषय पर समग्र रूप से चिंतन करना बहुत आवश्यक है  और हाल की घोषणाओं से लगता है कि सरकार ऐसा कर भी रही है। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि किसान की आर्थिक स्थिति अवश्य सुधरनी चाहिए। यह सुधार तेज़ी से करने की आवश्यकता है। एक राय  यह भी है कि  केवल न्यूनतम समर्थन मूल्य यानि मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एम एस पी) अथवा किसान से बढ़ी दरों पर अनाज की  खरीद करने से ही किसान का उत्थान नहीं होगा बल्कि इसके लिए किसान की आय के अन्य साधन भी बढ़ाने होंगे। ऐसा इस लिए क्योंकि अभी हमारे देश में खेती के उत्पाद पर्याप्त मात्रा में बेचने वाले किसान 20 प्रतिशत से अधिक नहीं होंगे । लगभग 80 प्रतिशत किसान लघु / छोटी और मझोली श्रेणी में आते है जिन्हें अनाज खरीदना पड़ता है। यदि उन्हें भी बाजार से मेहगे दर पर खरीद कर खाना पड़े तो वह मुनासिब नहीं दिखता।

किसान की वास्तविक आय तभी बढ़ेगी जब कम से कम छोटे किसानों के पास आय के वैकल्पिक साधन बढ़े । ऐसा एम नरेगा, पी एम किसान, जन धन योजना इत्यादि के द्वारा सीमित सतर पर हो भी रहा है, परंतु बहुत से अन्य उपाय भी ज़रूरी है जैसे गरीबों, मजदूरों, सीमांत और लघु किसानों को सब्सिडी पर राशन उपलब्ध कराना, कृषि में न्यायसंगत विविधीकरण लाना, इत्यादि   गांव में  कृषि एवं अन्य साधनों पर आधारित छोटे मोटे उद्योग धंधों की स्थापना करना। रोज़गार के साधन भी बढ़ने चाहिए। इसलिए निजी क्षेत्र के बड़े उद्योगपतियों/ पूंजीपतियों और योग्य दाताओं का अत्यधिक मुनाफा किसान - मज़दूरों, विशेष रूप में लघु और मझोले किसानों के हित में जुटाने एवं स्थानांतरित करने के लिए सरकार द्वारा माध्यम तथा दीर्घ अवधि वाली 'किसान विकास पत्र' अथवा 'किसान समर्थक कोष' जैसी योजनाओं को स्थापित एवं सुदृढ़ करने वाली योजना चलाने पर विचार करना चाहिए। 

जनसंख्या वृद्धि से आयदिन किसान के पास जमीन घटती और कटती जा रही है जहां न तो मशीनरी का उपयोग हो सकता है, न जलसंसाधन पर्याप्त रूप से उपयोग में लाये जा सकते हैं, न लागत कम हो सकती है,   उत्पादन बढ़ सकता है और न ही आमदन बढ़ सकती है ।

इसीलिए इस समस्या को ध्यान में रखते हुए उपाय के रूप में और जोत की उपलब्धता कों आर्थिक  दृष्टि से वायबल रखने के लिए, किसान उत्पादक संघ/एफपी  ओ/ सेल्फ हेल्प ग्रुप/कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, इत्यादि की बात भी की जाती है । परंतु ये संगठन तभी सफल हो सकते है जब इनके सदस्य एकमत हों, एक लक्ष्य हो, एक दूसरे के विश्वासपात्र हों, और अपने सदस्यों के प्रति कर्तव्य बोध से ओतप्रोत हों । इसके लिए ईमानदारी का जज्बा होना और पोस्ट हार्वेस्ट प्रबंधन, गुणवत्ता, तथा बैंक और बाजार व्यवस्था के बारे में प्रशिक्षित होना भी जरूरी है । गांव में ऐसा होना कोई मुश्किल नहीं है लेकिन नवयुवकों को विशेष रूप से इस दिशा में तैयार करने की जरूरत है ।

कोविड -19 के बाद का भारत कृषि के आधार पर ही आगे बढ़ेगा, ऐसा साफ प्रतीत हो रहा है ।यह ज़रूर है कि सरकार द्वारा   कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र के बीच हर तरह का संतुलन बिठाना पड़ेगा । ऋण सुविधा और फसल बीमा योजना को भी अधिक तर्कसंगत और किसानों के लिए आकर्षक और ग्राहय बनाना होगा ।

भारत के सतत और टिकाऊ  विकास के लिए यह एक आदर्श स्थिति होगी यदि आय के लिए सीधे तौर से खेती पर केवल 35-40 प्रतिशत जनता ही निर्भर हो तथा  शेष 60-65 प्रतिशत जनसंख्या उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोज़गार पाएं। युवा शक्ति का आकर्षण गाओं की ओर रहना चाहिए। शहर का आकर्षण इन्हें अस्थिर एवं अधिक पराश्रित बनाता है। 
 
लगता है कि सरकार के प्रयास शुद्ध और ईमानदार हैं परंतु कुछ समय से और भी बहुत सारी दिशाओं से आ रहे संकट चुनौती दे रहे हैं । आजकल हम में से ही कई लोग कहते हैं कि जवान और किसान एक समान परिश्रम करते हैं तो किसानों को उनके समान पारिश्रमिक क्यों नहीं ? मेरे विचार में हम में से ही जो जवान जिन परिस्थिति और जिस उद्देश्य से सीमा पर तैनात और सेवारत हैं उनकी निर्धारित आय से किसी की कोई प्रतिस्पर्धा नहीं होना  चाहिए। ये जवान विपरीत परिस्थिति में कष्ट सहते हैं, रातों को जागते हैं, मृत्यु को ललकारते हैं ताकि उनके देशवासी शत्रु के षड्यंत्रों और आक्रमणों से सुरक्षित रहें।

निश्चय ही आज के भूमिहीन, लघु, मध्यम और अन्य साधन हीन किसान  और  मजदूर की आर्थिक स्थिति भी  गंभीर चिंता का विषय है। इसके लिए सरकार द्वारा सही नीति और इस नीति का सही कार्यान्वयन आवश्यक है । किसी वाजिब स्तर तक न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि किसान को  सम्पन्न बनाने  की दिशा में एक कदम अवश्य है परन्तु यह काफी नहीं है । इसके अतिरिक्त भी बहुत से प्रयास करने की आवश्यकता है। अपनी ओर से किसानों को भी स्वयं की भौतिक तथा आर्थिक उत्पादकता सतत बढ़ाने के लिए सार्थक रूप से  संगठित और प्रयासरत होना पड़ेगा।  यह कार्य तो देशवासियों ने ही करना है - अपने घर में, गांव में, अपनी पंचायत में, जिले में, प्रांत में और देश में।

नेशन फर्स्ट/ सर्वप्रथम राष्ट्र !

- सी एम शर्मा 

 

शुक्रवार, 29 मई 2020

जय जय क्षीर भवानी माता

जय जय क्षीर भवानी माता,
जय तुल - मूल  निवासिनी माता,
कश्यप क्षेत्र विहारिणी माता,
जय जय क्षीर भवानी माता।

आज जगत सब व्यथित हुआ है?
कूप ह्रदय  का तृषित  हुआ  है?
ज्ञान की झड़ी लगा मेरी  माता,
जय जय क्षीर भवानी माता।

रोग, द्वेष, भय, लोभ, घृणा का
धुआं क्रोध संग घटा - टोप है,
ईर्ष्या, काम, मोह, मद वाला
रावण रास्ता रोक रहा है।

आज विवेक विवश है माता,
पवन पुत्र की याद पड़ी है,
तुम अनादि और सर्व व्याप्त हो
तेरी सृष्टि तेरी शरण पड़ी है ।

हे  माँ ! तेरे  कई  वर्ण हैं
अब चण्डी  बन  दुष्ट  संहारो,
हनुमद के संग अमित रूप ले
भक्तों के घर - घर में विराजो ।

दूर करो माँ  कष्ट हमारे ,
दशमुख का संहार करो माँ ,
धर्म ध्वजा स्थापित हो जाए,
निर्मल, शुभ वर जन को दो माँ।

निर्मल मति, दर्शन दो माता,
त्रिपुर सुंदरी! वर दो माता,
रागनिया, तेरी जय हो माता ,
जय जय क्षीर भवानी माता। 

जय जय क्षीर भवानी माता,
जय तुल - मूल  निवासिनी माता,
कश्यप क्षेत्र विहारिणी माता,
जय जय क्षीर भवानी माता।

- (शारदा लाल, भद्रवाह ) 

गुरुवार, 30 अप्रैल 2020


किसान - मज़दूर के हित में मई दिवस का संदेश आज ज्यादा प्रासंगिक

यह कहने में मुझे तनिक भी संशय और संकोच नहीं है कि देश की अधिकाँश जनता मूलतः समरसता, समाजवाद के सिद्धांत एवं आदर्शों से ही प्रेरित रही है। यह विचारधारा केवल 1986 के मई दिवस से ही विकसित नहीं हुई अपितु हज़ारों वर्ष पूर्व रामायण काल में अपनाई भी जा रही थी 

आदर्श राजा जैसे रंतिदेव, विदेह जनक, राम और कृष्ण प्रजा के कल्याण  के लिए असह्य दुःख सहने के लिए भी उद्द्यत  रहते थे। तभी तो राष्ट्र पिता एवं महान आत्मा मोहनदास करमचंद गांधी ने रामराज्य के सिद्धांतो को  ही आधुनिक भारत की आधारशिला माना और उसी दिशा में काम करते हुए  प्राणों की आहुति दे दी। (यह बात सही है कि इस संघर्ष में गाँधी जी अकेले नहीं थे। अपने - अपने तरीके से नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर सावरकर, भगत सिंह जैसे अन्य अनेक महान क्रांतिकारी एवं नेता तथा स्वतंत्रता सैनानी और समाजसेवी अपने अपने तरीके से कभी संयुक्त रूप से और कभी निजी तौर पर अपनी राहें तराश कर एक ही लक्ष्य की ओर आगे बढे थे।)
 
रामराज्य में समरसता
रामराज्य की नींव सभी नागरिकों की मर्यादा में रह कर अपने - अपने धर्म में रूचि, परस्पर प्रेम और आपसी विषमता तथा आतंरिक भेद-भाव के अभाव पर आधारित थी। प्रजा में भय, शोक और रोग नहीं थे। धर्म का आधार सत्य, शौच, दया और दान थे। सभी पुरुष एकपत्नीव्रती थे और सभी स्त्रियां मन, वचन और कर्म से पति का हित करने वाली थीं। पर्यावरण हितकारी होने से वनों में वृक्ष सदा फलते फूलते रहते थे और शीतल, मंद, सुगन्धित पवन बहता रहता था । नदियों, तालाबों और सागर में श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल, और सुखप्रद  स्वादिष्ट जल रहता था।  सभी हाथी, सिंह, पशु, पक्षी परस्पर स्वाभाविक वैर भूलकर वन में निर्भय हो कर विचरते और आनंद करते थे। कृषि संपन्न थी।  सूर्य आवश्यकतानुसार ही तपते थे और मेघ भी आवश्यकतानुसार ही परस्ते थे। धरती सदा खेती से हरी - भरी रहती थी।  मधु, दूध, अनाज भरपूर उत्पन्न होते थे और आवश्यकता अनुसार उपलब्ध होते थे। खानों से अनेकों प्रकार की मणियाँ और समुद्र से अनगणित  रत्न उपलब्ध  होते थे। राजा, ऋषि, मंत्री तथा प्रजा  निरंतर धर्म, ज्ञान  विषयों पर मंत्रणा और संवाद में रत रहते थे। महल, नगर, बाजार, चौराहे, गलियां, घर, चित्रशालाएँ, वाटिकाएं, उद्यान, बाग़, नदियें, घाट इत्यादि सूंदर, स्वच्छ बनाए गए थे तथा सभी स्त्री, पुरुष, बच्चे और बूढ़े सुखी, सदाचारी और सूंदर थे।

समरसता  के सन्दर्भ में यहां पर इस बात का वर्णन करना अत्यंत सामयिक दिखता है कि रामराज्य में "राजघाट सब प्रकार से सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहां चारों वर्णों के पुरुष स्नान करते हैं। सरयू जी (नदी) के किनारे सूंदर तुलसी जी के झुण्ड - के - झुण्ड बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं।" रामराज्य में अविद्या नष्ट हो गई, पाप छिप गए तथा  काम और क्रोध  मूँद  गये।"
वाल्मीकि ऋषि का सुझाव 
ऐसे रामराज्य की पृष्ठभूमि में महर्षि वाल्मीकि का वह सुझाव समाहित हुआ लगता है जो उन्होंने रामजी के वनवास काल में चित्रकूट प्रस्थान से पहले रामजी  को  अपने आश्रम में दिया था। जब भगवान राम ने वाल्मीकि जी से अपने निवास के लिए स्थान पूछा तो भक्तिभाव की दृष्टि से उन्होंने कुछ आध्यात्मिक स्थान कहे, परन्तु उनके अतिरिक्त भौतिक दृष्टि से जो निवास स्थान बताए वे राम जी के लिए अनुकरणीय तो थे ही, सामान्य लोगों के लिए भी अनुकरणीय बने।

वाल्मीकि ऋषि ने अपना विमर्श रखा, "हे भगवान, आप उनके ह्रदय में निवास करें जिनके न तो  काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न  लोभ है, न क्षोभ है, न राग है, न द्वेष है; और न कपट, दम्भ और माया ही है। जो सबके प्रिय और  हित  करने वाले है; जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा और गाली सामान हैं, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं; जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है; जो दूसरों की सम्पति देख कर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देख कर विशेष रूप से दुखी होते हैं; जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं; नीति  निपुणता में जिनकी जगत में मर्यादा है; जो जाती, पाँतिधन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देने वाला घर - सबको छोड़कर केवल आपको ही ह्रदय में धारण किये रहते हैं  हे रघुनाथ जी (राम जी) ! आप उनके ह्रदय में रहिये।
 
ग़ुलामी और साम्राज्य्वादी शक्तियों का बढ़ता प्रभुत्व 

समय बीता और हज़ारों वर्षों की ग़ुलामी और विभिन्न विदेशी शक्तियों जैसे शक, हूण, यवन, तुर्क, अरब, मुग़ल, अंग्रेज़ों इत्यादि साम्राज्य्वादी शक्तियों के बढ़ते प्रभुत्व के चलते भारतवर्ष में सामान्य नागरिकों, कामगारों, किसानों,  महिलाओं, इत्यादि का बिना किसी प्रभावकारी विरोध के हर तरह से शोषण बढ़ता गया । कामगारों इत्यादि से बेगार, न्यूनतम पारितोषक पर काम करवाना, इनका तिरस्कार और अवांछनीय कार्य - व्यवस्था, इत्यादि का प्रभावक्षेत्र बढ़ता गया जिसका प्रभावकारी विरोध करना आवश्यक हो गया था। भारत में ही नहीं, विश्व भर में किसान-मज़दूर-कामगार के साथ लगभग एहि व्यवहार हो रहा था।  अत्याचार अपने चरम पर था।
 
गुरू नानक देव जी की कामगारों के हक में आवाज़

ऐसे ही भारतीय परिदृश्य में गुरू नानक देव जी ने आज से प्रायः 500 वर्ष पूर्व किसानों, मज़दूरों और कामगारों के हक में आवाज़ उठाई थी और उस समय के अहंकारी और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खा कर उस का अहंकार तोड़ा और भाई लालो की काम की कमाई को सत्कार दिया था। गुरू नानक देव जी ने काम करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध निकालना' का संदेश दिया। गरीब मज़दूर और कामगार का विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश दिया। 1 मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय में मनाया जाता है।

महात्मा गाँधी के विचार

महात्मा गांधी ने आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों और किसानों पर निर्भर करती है। उद्योगपति स्वयं को मालिक या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगें। लोकतन्त्रीय ढांचो में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है जो राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं। वे प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और कानूनी व्यवस्था बनाऐ रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं।

मज़दूरों - किसानों - कामगारों का राज प्रबंध में योगदान
आज के भारत में मज़दूरों और किसानों की बड़ी संख्या का राज प्रबंध में बड़ा योगदान है। सरकार का रोल औद्योगिक शान्ति, उद्योगपतियों और मज़दूरों दरमियान सुखदायक, शांतमयी और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में उन का समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना और उन के मसलों को औद्योगिक ट्रिब्यूनल कायम कर निरपेक्षता और पारदर्शी ढंग से कुदरती न्याय के उसूल के सिद्धांत अनुसार इंसाफ़ प्रदान करना और उन की बेहतरी के लिए समय -समय से कानूनी और विवरण प्रणाली निर्धारित करना है। 

मई दिवस के शहीद!

1 मई 1886 को अमेरिका की सड़कों पर तीन लाख मजदूर उतर आए। वे विरोध कर रहे थे कि काम के घंंटों को आठ घंंटे किया जाए। इस हड़ताल के दौरान शिकागो की हेय मार्केट में बम ब्लास्ट हुआ था।  शिकागो में ही फिर 4 मई 1886 को मजदूर आठ घंटे काम की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए पुलिस ने गोलियां चला दी। इसमें सैकड़ों मजदूर मारे गए। मजदूर जब गोलियां खाकर गिर रहे थे, तब भी अपने खून से सने कपड़े हाथ से लहरा कर अपनी मांगों के नारे लगा रहे थे। शिकागो के मजदूर आंदोलन के नेताओं को फांसी सहित कड़ी सजाएं दी गई। बाद में शिकागो शहर में शहीद मजदूरों की याद में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया।

शिकागो के इन शहीद मजदूरों के खून से लाल हुए इन्हीं कपड़ों को प्रतीक मानकर दुनियां के मजदूरों ने अपना झंडा लाल बना दिया। 1889 को पेरिश में एक अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन हुआ। इसमें शिकागो के शहीद मजदूरों की याद में एक मई को "अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस" के रूप में मनाने की घोषणा हुई। इस घोषणा को करने वालों में उस समय भारत सहित दुनियां के 80 देशों के मजदूर व समाजवादी संगठन शामिल थे। इसी लाल झंडे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जताने के लिए ही दुनिया भर के मजदूर हितैषी लोग "लाल सलाम" बोल कर एक दूसरे का अभिवादन करने लगे

कोरोना संकट में मई दिवस का संदेश
आज विश्व में जब पूंजीपतियों के हित में मजदूरों के संघर्षों से प्राप्त तमाम अधिकारों को कम करके आंकने का क्रम जारी है और कोरोना संकट ने किसान - मज़दूरों की विकास में  भूमिका और उनकी असहाय स्थिति की ओर विवेचनात्मक दृष्टि से ध्यान आकृष्ट करने को विवश किया है तो ऐसे समय में शिकागो के शहीदों और मई दिवस का संदेश ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
 
(शारदा लाल, भद्रवाह )




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लहराई टेसू, सेमल के सर पर लाल चुनरिया,
उठ धाई आतुर धरती सतरंगी पहन चुनरिया।
हहर रही बहुअरि  किसके हित, पात पिटोरा के?
पिया न आए,
आमों में. ... (अब के बरस)....
नहीं आया टिंकोरा रे ।।

(स्रोत: अंजान)
 

शनिवार, 25 अप्रैल 2020

लॉक डाउन का सदुपयोग 

साधारणतयः गुल-दाउदी के फूल अक्टूबर के बाद खिलना आरम्भ करते हैं और इसकी कई प्रजातियें फरवरी - मार्च तक खिलती रहती हैं, परन्तु मुझे इस बार विशेष प्रसन्नता हो रही है कि अप्रैल माह के जाते - जाते भी अपने घर के छोटे से बगीचे में ये पौधे बैगनी और पीले रंग के पुष्पगुच्छ दे रहे हैं। 

आज - कल लॉक डाउन का समय चल रहा है और घर से बाहिर निकलना बंद है, तो जो समय नित्यकर्म पश्चात दूरदर्शन पर रामायण, महाभारत, चाणक्य और समाचार देखने के बाद मिलता है वह अधिकतर प्रकृति के साथ जुड़ कर बिताने में ही गुज़रता है। यह काम मनोरंजक भी है, स्वास्थ्य-वर्धक भी और शाक-सब्ज़ी उगाने पर आहार भी प्रदान करता है और बाज़ार से हर बार सब्ज़ी खरीद कर लाने की प्रवृति पर भी छोटा सा अंकुश भी लगाता है। मिर्च और पुदीना के पौधे लगे  हों तो खाना सु-स्वादु भी हो जाता है। 

मैंने अपने बगीचे में अभी श्वेत और लाल फराशबीन (कन्टेंडर) के पौधे बोए हैं जिनमे फूल और फलियां पड़नी शुरू हो गई हैं। भिंडी (संकर/हाइब्रिड) के पौधे ज़मीन से बाहिर निकल चुके हैं । टमाटर हाइब्रिड के १४ - १५ पौधे, हाइब्रिड मिर्च के ५ - ६ पौधे और बैंगन (उन्नत प्रजाति) के १० - १२ पौधे भी लगाए हुए हैं। इनके अतिरिक्त कद्दू के ६ पौधे सावधानी पूर्वक मिट्टी समेत प्रत्यारोपित करके लगाए हैं। 

बगीचे की सुंदरता के लिए गज़ीनिया, डहेलिया, गुलाब, फ्लॉक्स, के फूल और कुछ गमलों में सजावटी पौधे भी लगे हुए हैं। इनके छायाचित्र लेने में भी कुछ समय सकारात्मक ढंग से उपयोग हो जाता है। इन्हें मोबाइल फ़ोन पर साझा करने से अपनी जानकारी भी बढ़ती है और अपने संपर्क में मित्र-जनों और छोटे-बड़ों की भी। 

ये गतिविधियां निश्चय ही हमें कुछ सीमा तक आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करती हैं। हम सभी लोग अपने पास जितनी भी जगह है, चाहे बगीचे में, घर की छत पे, बरामदे में अथवा छज्जे में, थोड़ी बहुत सब्ज़ी, औषधीय और सजावटी पौधे, सुगन्धयुक्त पौधे सुविधानुसार उगाएं तो समय, स्थान और साधन का सदुपयोग होगा। आत्मनिर्भरता की ओर यह एक प्रशंसनीय कदम होगा जिसकी ओर प्रधानमन्त्री ने संकेत भी किया है।         

 
 
 
 
 
 
 
 
 


 

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

जय माता की 

पूजा-पाठ और अध्य्यन का
यह अवसर है नवरात्रों में,
चलो सभी एकांत में बैठें
प्रभु से लौ लगाने में।

धर्म स्थलों  से दूर रहें हम
शुद्ध इन्हें भी रखना है,
मन मंदिर में ध्यान लगाएं
स्पर्श रोग से बचना है।

आज बड़ा संकट है छाया
मानवता पर, धरती पर,
घातक बन वाइरस आया
'कोविद उन्नीस' डर बन कर।

चीनी शहर 'वुहान' से उपजा,
आतंकित हैं सारा संसार,
अपनों से सब डरे हुए हैं
अपने से भी भय है आज।

ज़रा सा छू लेने से घातक
हो जाता यह वाइरस रोग,
साबुन से हाथों को धोवें
घरों में बैठें सारे  लोग।
 
मन-मंदिर में हम बैठे हैं
विनय यहीं से करते आज,
जय माता की, जय माता की,
जय करुणामयी, रखना लाज।

शारदा लाल, भद्रवाह

 

सोमवार, 27 जनवरी 2020

देश ने २६ जनवरी, २०२०, रविवार के दिन  भारत का ७१वां गणतंत्र दिवस मनाया।  शिशिर ऋतु की खुली मनमोहक धूप और तन को आनंदित करने वाली तपिश ने लगभग सभी को घर से बाहिर निकलने के लिए प्रेरित किया। बाहिर निकलने वालों में एक बार फिर सब से आगे-आगे थे जवान और किसान।

वैसे तो शायद ही कोई दिन होगा जब जवान और किसान घरों में बैठते हों। वे जानते हैं कि यदि वे घर में बैठे रहें तो सीमाओं पर घुसपैठ और सड़कों पर अराजकता कौन रोकेगा, मातृभूमि की संतान को अन्न उपलब्ध कौन कराएगा, कल-कारखानों के लिए कच्चा माल और न केवल मानव जाति अपितु पशु धन के लिए भी आहार कौन उपलब्ध कराएगा ! परन्तु आज वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर पिछले कुछ माह की सर्दी, वर्षा और हिमपात के उपरान्त सुखद मौसम का आनंद लेने के साथ-साथ अपने कर्तव्य को निभाने सीमाओं और खेतों में डट गए थे।

यह देश का गणतंत्र ही है जो सभी नागरिकों को सुखी एवं सम्मानित जीवन जीने के अधिकार देता है।  यह गणतंत्र सरकार पर न्याय एवं विधान का सम्मान करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा निश्चित करने का दायित्व भी सौंपता है। यही गणतंत्र है जो प्रत्येक नागरिक पर देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को भी निश्चित करता है। यदि देश के नागरिक जिम्मेदारियें न निभाएं तो वे सुरक्षित कैसे रह पाएंगे। अराजकता किसी को लाभ नहीं सकती।

इस गणतंत्र की रक्षा के लिए असंख्य बाल, नवयुवक, वृद्ध स्त्री-पुरुषों ने स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और फिर उसके पश्चात आज-तक विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार के बलिदान दिए हैं यहां तक कि प्राणों को भी न्योछावर कर दिया है।

कल जहाँ भी गया, मैंने जम्मु शहर में तो जनसमूहों द्वारा प्रत्येक चौराहे, गली, मोहल्ले, झुग्गी, भवन, दूकान, शॉपिंग माल, स्कूल, कॉलेज, इत्यादि स्थान पर तिरंगे झंडे को शान से फहराते हुए देखा परन्तु गाऊँ में भी उत्साह कम नहीं था। 

जम्मु शहर से कोई ६ किलोमीटर दूर पश्चिम में मुठी गाऊँ  में रहने वाले कुछ किसानी करने वाले लोग गाय बछड़े को धूप में रख कर सजावटी पौधों की खेती करके प्रसन्नचित होते हुए दिखे। वैसे तो अब यह गाऊँ भी पूरी तरह से शहर में परिवर्तित हो गया है परन्तु गाऊँ की विशेषताएं भी संजोए हुए है। प्रातः काल यहां के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में स्थानीय प्रिंसिपल ने कर्मचारियों तथा नागरिकों के समक्ष तिरंगा लहराया। वार्ड नंबर ६७ के पौर श्री सूरज प्रकाश पाधा ने रणबीर नहर के किनारे गणमान्य लोगों  की उपस्थिति में तिरंगा फहराया। श्री पाधा ने नागरिकों से स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग का अनुरोध किया। 

मुठी  से कोई  ३ किलोमीटर दूर पश्चिम में वीरान पड़े हुए खेत दिखे जो या तो अधिक वर्षा के कारण बंजर पड़े थे या अब शहरीकरण की चपेट में आकर किसी नए निर्माण का इंतज़ार कर ररहे हैं। और आगे  २  किलोमीटर दूर पश्चिम में अकलपुर गाऊँ में गेहूं की फसल  सर्दी का प्रकोप सहने के पश्चात मुखर कर बाहिर आती हुई दिखती है।  मौसम अनुकूल होने पर इसमें निखार आने के आसार हैं। कुछ दूर और आगे जाकर  पता चलता  है कि  किसान कितना प्रगतिशील और निर्णय लेने  में समक्ष होता जा रहा है।  गेहूं जैसी परम्परागत फसल को छोड़ कर  बंद गोभी जैसी फसलों की खेती उसकी कृषि -शैली  का अंग  बन गई है।  पेड़ों के बीच में से छन कर निकलती हुई धूप ठण्ड से ठिठुरते प्राणी को रोमांचित भी करती है और उसमें नव चेतना और हर्सोल्लास की भावना का संचार करती है।

यही समय है जब पिछैती गेहूं की फसल में चौड़े पत्ते वाले खरपतवार की रोकथाम के लिए २,४, डी  इथाइल एस्टर का छिड़काव किया जाना चाहिए। त्रिलोक चंद जी जैसे कई किसान मैंने इस कार्य में संलग्न पाए और कुछ लोग फसल में यूरिया उर्वरक भी छिटक कर उपयोग रहे थे।

थोड़ी सी दूरी पर आगे जा कर गेंदा फूलों की खेती देख कर मन और अधिक आनंदीत हुआ । कृषि प्रणाली में विविधीकरण कृषक की आय में बढ़ोतरी का उत्तम उपाय है, परन्तु कृषक की चाहिए कि वे संगठन के रूप में कार्य करें जिससे उन्हें बीज, खाद, दवाइयें इत्यादि सुलभ हों और प्रसंस्करण तथा विपणन (मार्केटिंग) में भी सुगमता हो।  किसान भाई समझ लें कि प्रत्येक क्रिया में प्रत्येक स्तर पर शक्ति तो संगठन  में ही है । हाँ, यह अवश्य है कि प्रत्येक क्रिया सकारात्मक ही होनी चाहिए।

वहीँ गाऊँ में आगे गुज्जर लोग कुल्ले बनाकर अपनी भैंस-गाय पालते हुए जीवनयापन करते हुए मिले। सभी लोगों का परस्पर सौहार्द देश को सशक्त करता है। स्वाभाविक है कि इन लोगों में  भी अपनी जीवन शैली में सुधार लाने की प्रबल इच्छा है। सरकार को चाहिए कि इस समुदाय के लिए कोई ऐसी योजना बने जो इनके  परम्परागत पशुपालन के व्यवसाय को उन्नत, सरल और अधिक लाभप्रद बना सके।

अकलपुर से कुछ ही दूर और आगे सरोडा गाउँ में सड़क के किनारे सेवा-निवृत्त वीर सैनिकों को अपने बच्चों, पोते-पोतियों और स्थानीय लोगों के साथ  सेना के एक शहीद  स्मारक पर  भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित  करते हुए गौरवान्वित होते हुए देखा। मैं भी नतमस्तक हुए बिना कैसे रहता? इसी गाऊँ में युवा किसान कुलदीप सिंह अपनी माता के साथ कडम फसल की रोपाई कर रहे थे। यह  फसल विशेष प्रकार से कश्मीरी पंडितों की मन-भावन  शाक-भाजी है। इसमें विटामिन और अन्य पौष्टिक तत्व के साथ स्वाद भी उत्तम होता है और अब देश के अन्य भागों में भी प्रचलित हो गई है।  इसकी खेती किसान को कम लागत पर अधिक लाभ दे सकती है।

सरोड़ा से आगे घो - मनहासां की तरफ जाएं तो किसान अन्य फसलों जैसे तोरिअ, सरसों के साथ गन्ना भी उगाते हैं। कुछ प्रगतिशील किसान लीची की खेती कर रहे हैं और बीच में अंतरवर्तीय फसल जैसे गेहूं (दाने और चारे, दोनों के लिए) भी ले रहे हैं। प्रीतम सिंह जी सैनी जैसे किसान ब्रोक्कोली की खेती वृहद्द स्तर पर कर रहे हैं।  यह प्रणाली उन्हें समृद्ध भी बना रही है।

आगे देवीपुर और भगतपुर की ओर जाते हुए मुझे यह देख कर ठीक नहीं लगा कि एक तो गेहूं जैसी फसल अधिक  वर्षा में जलभराव के कारण दबी सी रह  गई है वहीँ दूसरी ओर पॉलिथीन शीट और कचरा पानी संग ऊपर के इलाकों से बह कर निचले खेतों में एकत्रित हो गया है जो हानिकारक है।

भगतपुर चौक मेटाडोर स्टॉप के पास में पेड़ों के झुरमुट के नीचे साफ़-सुथरे टाइलों से सजे चौपाल को देख कर मन फिर से प्रफुल्लित हुआ। सन्देश मिला कि हमें प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर सचेत होना चाहिए और इस स्थिति से उबरना चाहिए।

गणतंत्र दिवस की इस लघु यात्रा से मेरा यह विश्वास और दृढ हुआ है कि यद्यपि  देश की समृद्धि में एक-एक नागरिक का योगदान महत्त्व रखता है परन्तु सामूहिक तौर पर "जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान" ही एक ऐसा मन्त्र है जो "जय हिन्द" के उद्घोष को चरितार्थ करता है !

सी.एम.शर्मा



 

शनिवार, 14 दिसंबर 2019


सोलकी--पंजाह सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत की आवश्यकता 

अभी २ दिन पूर्व मैं कालाकोट के पंजाह गाऊँ में अपने घनिष्ठ सम्बन्धी के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु गया था। वर्षा छमाछम बरस रही थी। जम्मू से राजौरी-पूंछ मुख्य मार्ग की स्थिति देख कर अच्छा लगा, परन्तु सोल्की से पंजाह की ओर घूमते ही इस ग्रामीण सड़क की स्थिति देख कर अत्यंत दुःख हुआ। टूटी और गड्ढेदार सड़क, मुसलाधार बारिश, मेटाडोर में ओवरलोड छात्र, कर्मचारी और सामान्य जनता अपनी जान को जोखिम में डाल कर यात्रा करने को मजबूर हैं। ईश्वर न कर कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो कौन उत्तरदायी होगा ? आवश्यकता है इस सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत करने की। जनता वर्षों से सरकार की ओर देख रही है। अभी आशा तो बहुत है। उम्र - रसीदा लोग कहते हैं कि यदि अभी नहीं हुआ तो फिर न जाने उनके जीते जी होगा या नहीं।     


वानर सेना का  आतंक 

पंजाह गाऊँ  में  मेरी  नज़र चारों तरफ खेतों में धड़ल्ले से घूम रहे बन्दरों के टोलों पर पड़ी। ये बन्दर खेतों में बोए हुए गेहूं के बीज निकाल-निकाल कर खा रहे थे।  किसानों ने इस विषय में कई बार प्रशासन से शिकायत की है। कोई कारगर समाधान न मिलने पर खेत के खेत लोगों ने दुखी हो कर फसल से खाली  ऱखने शुरू कर दिए हैं।

वर्ष २०१५-१६ में प्राप्त एक अनुमान के अनुसार बन्दर जम्मू संभाग में कठुआ, साम्बा, उधमपुर, जम्मू, राजौरी, रिआसी, डोडा ज़िलों के २५० से अधिक गाऊँ में लगभग १५, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर मक्का, गेहूं, धान, फल और सब्ज़ी फसलों को अत्यधिक हानि पहुंचा रहे हैं। ४, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फसलें तो बोई ही नहीं जा रहीं। तब ३३ करोड़ रूपये से अधिक का आर्थिक नुक्सान आंका गया था ।

भूख के मारे हुए जंगली पशु फलदार फसलों जैसे आम, अमरुद, नाशपाती, अंगूर, नीम्बू जाति के वृक्षों, लीची, आड़ू, आलूबुखारा, और खुबानी के अंतर्गत लगभग ६८,३८४ हेक्टेयर क्षेत्र में व्यापक नुक्सान पहुंचा रहे हैं। पंजाह गाऊँ में जो तस्वीर मैंने देखी वह बताती है कि यह नुक्सान अब कई गुणा बढ़ा होगा।

बन्दर वन्य प्राणी है और इसका सरोकार बहुधा वनों तथा वन विभाग के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों से है। इसका व्यवहार कृषि - किसानी और जम्मू जैसे मंदिरों वाले शहर में साधारण लोगों से जुड़ा हुआ है। निर्लज्ज और शरारती वानर खम्बों, तारों, गाड़ियों और घरों की छतों पर हुड़दंग मचाकर लोगों को भयभीत करते हैं। कृषि विभाग ने भी वानरों द्वारा कृषि में हो रही हानि का मुद्दा वन विभाग से उठाया है। परन्तु समाधान अभी तक नहीं मिल पाया है।

वास्तव में वानर सेना का आतंक वनों की घटती सघनता के कारण से है। वनों के बीच से गुज़रते चौड़े - चौड़े मार्ग, रेलवे पटरियों, बस्तियों, तथा कई प्रकार की कथित विकास परियोजनाओं ने इनके प्राकृतिक निवास स्थलों को  उजाड़ दिया  है। अँधा-धुंध कटते पेड़-पौधों को किसने नहीं देखा।  कुछ दशक पूर्व ऊंचे पर्वतों और पहाड़ियों पर घने जंगल होते थे परन्तु अब ये तीव्र गति से क्षीण होते जा रहे हैं। इन्हीं कारणों से मैंने स्वयं देखा है, कई स्थानों पर चश्में तथा छोटे-छोटे  नदी और नद अदृश्य होते जा रहे हैं। फलस्वरूप, मानव तथा वन-प्राणियों के बीच पानी और अन्न के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

बहुत से किसान बंदरों को नपुंसक बनाने की औषधि के उपयोग की वकालत कर रहे हैं तो कई और भी हैं जो इन्हें गोली से उड़ाने की अतिवादी आज्ञा मांगते हैं । 
कृषि विभाग तथा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सुझाव देते हैं कि किसान भाई-बहन पर्यायी फसलें जैसे अदरक, हल्दी, थोम, भिंडी, गेंदा के फूल जैसी तथा औषधीय और सुगन्धित फसलें उगाएं जो बंदरों को आकृष्ट नहीं करतीं । कृषि विभाग  इस सम्बन्ध में प्रचार - प्रसार भी कर रहा है परन्तु इन सब के लिए समुचित बीज, प्रसंस्करण और बाज़ार की सुविधाएं भी तो प्रदान करनी होंगी ।

वन विभाग और भू-संरक्षण विभाग परंपरागत जल-स्रोतों के जीर्णोद्धार और पानी को रोकने तथा संचय करने के लिए नए तालाब तथा बांधों के निर्माण की बात कर रहे हैं जिससे चश्मों में दुबारा पानी बहने लगेगा। सामाजिक वानिकी विभाग अनुपयोगी पड़े हुए क्षेत्रों तथा क्षीण हुए जंगलों को पुनर्जीवित करने के प्रयास में संलग्न है।   

स्वाभाविक है कि मानव द्वारा आमंत्रित इस आतंक से छुटकारा पाने का एक-मात्र उपाय  भी वन तथा वन्य-प्राणी विभाग, कृषि विभाग, बागबानी विभाग, शहरी तथा ग्राम विकास विभाग तथा सामान्य जनता द्वारा परस्पर सहयोग से और सूझ बूझ के आधार पर तैयार किये जाने वाली कार्य-योजना से ही संभव है। ज़मीनी स्तर पर काम काज की गुणवत्ता को पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष परिणाम दिलाने वाली रणनीति से ही लागू  करना होगा। स्थानीय जंगली फल उत्पादक वृक्ष जो पशुओं को उनकी खुराक उपलब्ध करा सकें जंगलों में व्यापक तौर पर लगाए जाने चाहियें। स्थानीय पेड़ जैसे  शीशम, पीपल, बरगद, इत्यादि जो दीर्घजीवी परन्तु लुप्तप्राय होते जा रहे हैं, उन्हें बढ़-चढ़ कर लगाया जाना चाहिए। जल संरक्षण के प्रयास  तेज़ होने चाहियें। 
(शेष फिर।  शारदा लाल, भदरवाह )