किसान - मज़दूर के हित में मई दिवस का संदेश आज ज्यादा प्रासंगिक
यह कहने में मुझे तनिक भी संशय और संकोच नहीं है कि देश की अधिकाँश जनता मूलतः समरसता,
समाजवाद के सिद्धांत एवं आदर्शों से ही प्रेरित रही है। यह विचारधारा केवल 1986 के मई दिवस से ही विकसित नहीं हुई अपितु
हज़ारों वर्ष पूर्व रामायण काल में अपनाई भी जा रही थी ।
आदर्श राजा जैसे
रंतिदेव, विदेह जनक, राम और कृष्ण प्रजा के कल्याण के लिए असह्य दुःख सहने
के लिए भी उद्द्यत रहते थे।
तभी तो राष्ट्र पिता एवं महान आत्मा मोहनदास करमचंद गांधी ने रामराज्य के सिद्धांतो को ही आधुनिक भारत की आधारशिला माना और उसी दिशा में काम करते हुए प्राणों
की आहुति दे दी। (यह बात सही है
कि इस संघर्ष में गाँधी जी अकेले नहीं थे। अपने -
अपने तरीके से नेताजी सुभाष चंद्र बोस, वीर
सावरकर, भगत सिंह जैसे अन्य अनेक महान क्रांतिकारी एवं नेता
तथा स्वतंत्रता सैनानी और समाजसेवी अपने अपने तरीके से
कभी संयुक्त रूप से और कभी निजी तौर पर अपनी राहें तराश कर एक ही लक्ष्य की ओर आगे
बढे थे।)
रामराज्य की नींव सभी नागरिकों की मर्यादा में रह कर अपने -
अपने धर्म में रूचि, परस्पर प्रेम और आपसी विषमता तथा आतंरिक भेद-भाव के अभाव पर आधारित थी। प्रजा में भय, शोक और रोग नहीं थे। धर्म का आधार सत्य,
शौच, दया और दान थे। सभी पुरुष एकपत्नीव्रती
थे और सभी स्त्रियां मन, वचन और कर्म से पति का हित करने
वाली थीं। पर्यावरण हितकारी होने से वनों में वृक्ष सदा फलते फूलते रहते थे और
शीतल, मंद, सुगन्धित पवन बहता रहता था । नदियों, तालाबों और सागर में श्रेष्ठ, शीतल, निर्मल, और सुखप्रद स्वादिष्ट जल रहता था।
सभी हाथी, सिंह,
पशु, पक्षी परस्पर स्वाभाविक वैर भूलकर वन में निर्भय हो कर विचरते और आनंद करते थे। कृषि संपन्न थी।
सूर्य आवश्यकतानुसार ही तपते थे और मेघ भी आवश्यकतानुसार ही परस्ते थे। धरती
सदा खेती से हरी - भरी रहती
थी। मधु, दूध, अनाज भरपूर उत्पन्न होते थे और आवश्यकता अनुसार उपलब्ध होते थे। खानों से
अनेकों प्रकार की मणियाँ और समुद्र से अनगणित रत्न
उपलब्ध होते थे। राजा, ऋषि, मंत्री
तथा प्रजा निरंतर धर्म, ज्ञान विषयों पर मंत्रणा और संवाद में रत रहते थे।
महल, नगर, बाजार, चौराहे, गलियां, घर, चित्रशालाएँ, वाटिकाएं, उद्यान,
बाग़, नदियें, घाट
इत्यादि सूंदर, स्वच्छ बनाए गए थे तथा सभी स्त्री, पुरुष, बच्चे
और बूढ़े सुखी, सदाचारी और सूंदर थे।
समरसता के सन्दर्भ
में यहां पर इस बात का वर्णन करना अत्यंत सामयिक दिखता
है कि रामराज्य में "राजघाट
सब प्रकार से सुन्दर और श्रेष्ठ है, जहां चारों वर्णों के
पुरुष स्नान करते हैं। सरयू जी (नदी) के किनारे सूंदर
तुलसी जी के झुण्ड - के - झुण्ड
बहुत से पेड़ मुनियों ने लगा रखे हैं।" रामराज्य में अविद्या नष्ट हो गई,
पाप छिप गए तथा काम और क्रोध मूँद
गये।"
वाल्मीकि ऋषि का सुझाव
ऐसे रामराज्य की पृष्ठभूमि में
महर्षि वाल्मीकि का वह सुझाव समाहित हुआ लगता है जो उन्होंने रामजी के वनवास काल
में चित्रकूट प्रस्थान से पहले रामजी को अपने
आश्रम में दिया था। जब भगवान राम ने वाल्मीकि जी से
अपने निवास के लिए स्थान पूछा तो भक्तिभाव की दृष्टि से उन्होंने कुछ आध्यात्मिक
स्थान कहे, परन्तु उनके अतिरिक्त भौतिक दृष्टि से जो निवास स्थान बताए वे राम जी के लिए अनुकरणीय तो थे ही, सामान्य
लोगों के लिए भी अनुकरणीय बने।
वाल्मीकि ऋषि ने अपना विमर्श रखा,
"हे भगवान, आप उनके ह्रदय में निवास करें
जिनके न तो काम, क्रोध, मद,
अभिमान और मोह है; न
लोभ है, न क्षोभ है,
न राग है, न द्वेष है; और
न कपट, दम्भ और माया ही है। जो सबके प्रिय और हित
करने वाले है; जिन्हें दुःख और सुख तथा
प्रशंसा और गाली सामान हैं, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन
बोलते हैं; जो पराई स्त्री को जन्म देने वाली माता के समान
जानते हैं और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है;
जो दूसरों की सम्पति देख कर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देख कर विशेष रूप से दुखी होते हैं; जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं; नीति
निपुणता में जिनकी जगत में मर्यादा है; जो
जाती, पाँति, धन, धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और
सुख देने वाला घर - सबको छोड़कर केवल आपको ही ह्रदय में
धारण किये रहते हैं हे रघुनाथ जी (राम जी) ! आप उनके ह्रदय में रहिये।
ग़ुलामी और साम्राज्य्वादी शक्तियों का बढ़ता प्रभुत्व
समय बीता और हज़ारों वर्षों की ग़ुलामी और विभिन्न विदेशी शक्तियों जैसे शक, हूण, यवन, तुर्क, अरब, मुग़ल, अंग्रेज़ों इत्यादि साम्राज्य्वादी शक्तियों के बढ़ते प्रभुत्व के चलते भारतवर्ष में सामान्य नागरिकों, कामगारों, किसानों, महिलाओं, इत्यादि का बिना किसी प्रभावकारी विरोध के हर तरह से शोषण बढ़ता गया । कामगारों इत्यादि से बेगार, न्यूनतम पारितोषक पर काम करवाना, इनका तिरस्कार और अवांछनीय कार्य - व्यवस्था, इत्यादि का प्रभावक्षेत्र बढ़ता गया जिसका प्रभावकारी विरोध करना आवश्यक हो गया था। भारत में ही नहीं, विश्व भर में किसान-मज़दूर-कामगार के साथ लगभग एहि व्यवहार हो रहा था। अत्याचार अपने चरम पर था।
गुरू नानक देव जी की कामगारों के हक में आवाज़
ऐसे ही भारतीय परिदृश्य में गुरू नानक देव जी ने आज से प्रायः 500 वर्ष पूर्व किसानों,
मज़दूरों और कामगारों के हक में आवाज़ उठाई थी और उस समय के अहंकारी
और लुटेरे हाकिम ऊँट पालक भागों की रोटी न खा कर उस का अहंकार तोड़ा और भाई लालो
की काम की कमाई को सत्कार दिया था। गुरू नानक देव जी ने ‘काम
करना, नाम जपना, बाँट छकना और दसवंध
निकालना' का संदेश दिया। गरीब मज़दूर और कामगार का
विनम्रता का राज स्थापित करने के लिए मनमुख से गुरमुख तक की यात्रा करने का संदेश
दिया। 1 मई को भाई लालो दिवस के तौर पर भी सिक्ख समुदाय में मनाया जाता है।
महात्मा
गांधी ने
आधुनिक भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कहा था कि किसी देश की तरक्की उस देश के कामगारों
और किसानों पर निर्भर करती है। उद्योगपति स्वयं को मालिक
या प्रबंधक समझने की बजाय अपने-आप को ट्रस्टी समझने लगें। लोकतन्त्रीय ढांचो में तो सरकार भी लोगों की तरफ़ से चुनी जाती है जो
राजनीतिक लोगों को अपने देश की बागडोर ट्रस्टी के रूप में सौंपते हैं। वे प्रबंध चलाने के लिए मज़दूरों, कामगारों और किसानों
की बेहतरी, भलाई और विकास, अमन और
कानूनी व्यवस्था बनाऐ रखने के लिए वचनबद्ध होते हैं।
मज़दूरों - किसानों - कामगारों का राज प्रबंध में योगदान
आज के भारत में मज़दूरों और किसानों
की बड़ी संख्या का राज प्रबंध में बड़ा योगदान है। सरकार का रोल औद्योगिक शान्ति,
उद्योगपतियों और मज़दूरों दरमियान सुखदायक, शांतमयी
और पारिवारिक संबंध कायम करना, झगड़े और टकराव की सूरत में
उन का समझौता और सुलह करवाने का प्रबंध करना और उन के मसलों को औद्योगिक
ट्रिब्यूनल कायम कर निरपेक्षता और पारदर्शी ढंग से कुदरती न्याय के उसूल के
सिद्धांत अनुसार इंसाफ़ प्रदान करना और उन की बेहतरी के लिए समय -समय से कानूनी और
विवरण प्रणाली निर्धारित करना है।
मई दिवस के शहीद!
1 मई 1886 को अमेरिका की सड़कों पर तीन लाख मजदूर उतर
आए। वे विरोध कर रहे थे कि काम के घंंटों को आठ घंंटे किया जाए। इस हड़ताल के
दौरान शिकागो की हेय मार्केट में बम ब्लास्ट हुआ था। शिकागो
में ही फिर 4 मई 1886 को मजदूर आठ घंटे
काम की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए पुलिस
ने गोलियां चला दी। इसमें सैकड़ों मजदूर मारे गए। मजदूर जब गोलियां खाकर गिर रहे थे,
तब भी अपने खून से सने कपड़े हाथ से लहरा कर अपनी मांगों के नारे लगा
रहे थे। शिकागो के मजदूर आंदोलन के नेताओं को फांसी सहित कड़ी सजाएं दी गई। बाद में
शिकागो शहर में शहीद मजदूरों की याद में पहली बार मजदूर दिवस मनाया गया।
शिकागो के इन शहीद मजदूरों के खून से लाल हुए इन्हीं कपड़ों को प्रतीक मानकर
दुनियां के मजदूरों ने अपना झंडा लाल बना दिया। 1889 को पेरिश में एक
अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन हुआ। इसमें शिकागो के शहीद मजदूरों की याद में एक
मई को "अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस" के रूप में मनाने की घोषणा हुई। इस
घोषणा को करने वालों में उस समय भारत सहित दुनियां के 80 देशों
के मजदूर व समाजवादी संगठन शामिल थे। इसी लाल झंडे के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को
जताने के लिए ही दुनिया भर के मजदूर हितैषी लोग "लाल सलाम" बोल कर एक
दूसरे का अभिवादन करने लगे।
कोरोना संकट में मई दिवस का संदेश
आज विश्व में जब पूंजीपतियों के हित में मजदूरों के संघर्षों से प्राप्त तमाम अधिकारों
को कम करके आंकने का क्रम जारी है और कोरोना संकट ने किसान - मज़दूरों की विकास में भूमिका और उनकी असहाय स्थिति की ओर विवेचनात्मक दृष्टि से ध्यान आकृष्ट करने को विवश किया है तो ऐसे समय में शिकागो के शहीदों
और मई दिवस का संदेश ज्यादा प्रासंगिक हो गया है।
(शारदा लाल, भद्रवाह )
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लहराई टेसू, सेमल के सर पर लाल चुनरिया,
उठ धाई आतुर धरती सतरंगी पहन चुनरिया।
हहर रही बहुअरि किसके हित, पात पिटोरा के?
पिया न आए,
आमों में. ... (अब के बरस)....
नहीं आया टिंकोरा रे ।।
(स्रोत: अंजान)
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