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शनिवार, 14 दिसंबर 2019


सोलकी--पंजाह सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत की आवश्यकता 

अभी २ दिन पूर्व मैं कालाकोट के पंजाह गाऊँ में अपने घनिष्ठ सम्बन्धी के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु गया था। वर्षा छमाछम बरस रही थी। जम्मू से राजौरी-पूंछ मुख्य मार्ग की स्थिति देख कर अच्छा लगा, परन्तु सोल्की से पंजाह की ओर घूमते ही इस ग्रामीण सड़क की स्थिति देख कर अत्यंत दुःख हुआ। टूटी और गड्ढेदार सड़क, मुसलाधार बारिश, मेटाडोर में ओवरलोड छात्र, कर्मचारी और सामान्य जनता अपनी जान को जोखिम में डाल कर यात्रा करने को मजबूर हैं। ईश्वर न कर कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो कौन उत्तरदायी होगा ? आवश्यकता है इस सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत करने की। जनता वर्षों से सरकार की ओर देख रही है। अभी आशा तो बहुत है। उम्र - रसीदा लोग कहते हैं कि यदि अभी नहीं हुआ तो फिर न जाने उनके जीते जी होगा या नहीं।     


वानर सेना का  आतंक 

पंजाह गाऊँ  में  मेरी  नज़र चारों तरफ खेतों में धड़ल्ले से घूम रहे बन्दरों के टोलों पर पड़ी। ये बन्दर खेतों में बोए हुए गेहूं के बीज निकाल-निकाल कर खा रहे थे।  किसानों ने इस विषय में कई बार प्रशासन से शिकायत की है। कोई कारगर समाधान न मिलने पर खेत के खेत लोगों ने दुखी हो कर फसल से खाली  ऱखने शुरू कर दिए हैं।

वर्ष २०१५-१६ में प्राप्त एक अनुमान के अनुसार बन्दर जम्मू संभाग में कठुआ, साम्बा, उधमपुर, जम्मू, राजौरी, रिआसी, डोडा ज़िलों के २५० से अधिक गाऊँ में लगभग १५, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर मक्का, गेहूं, धान, फल और सब्ज़ी फसलों को अत्यधिक हानि पहुंचा रहे हैं। ४, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फसलें तो बोई ही नहीं जा रहीं। तब ३३ करोड़ रूपये से अधिक का आर्थिक नुक्सान आंका गया था ।

भूख के मारे हुए जंगली पशु फलदार फसलों जैसे आम, अमरुद, नाशपाती, अंगूर, नीम्बू जाति के वृक्षों, लीची, आड़ू, आलूबुखारा, और खुबानी के अंतर्गत लगभग ६८,३८४ हेक्टेयर क्षेत्र में व्यापक नुक्सान पहुंचा रहे हैं। पंजाह गाऊँ में जो तस्वीर मैंने देखी वह बताती है कि यह नुक्सान अब कई गुणा बढ़ा होगा।

बन्दर वन्य प्राणी है और इसका सरोकार बहुधा वनों तथा वन विभाग के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों से है। इसका व्यवहार कृषि - किसानी और जम्मू जैसे मंदिरों वाले शहर में साधारण लोगों से जुड़ा हुआ है। निर्लज्ज और शरारती वानर खम्बों, तारों, गाड़ियों और घरों की छतों पर हुड़दंग मचाकर लोगों को भयभीत करते हैं। कृषि विभाग ने भी वानरों द्वारा कृषि में हो रही हानि का मुद्दा वन विभाग से उठाया है। परन्तु समाधान अभी तक नहीं मिल पाया है।

वास्तव में वानर सेना का आतंक वनों की घटती सघनता के कारण से है। वनों के बीच से गुज़रते चौड़े - चौड़े मार्ग, रेलवे पटरियों, बस्तियों, तथा कई प्रकार की कथित विकास परियोजनाओं ने इनके प्राकृतिक निवास स्थलों को  उजाड़ दिया  है। अँधा-धुंध कटते पेड़-पौधों को किसने नहीं देखा।  कुछ दशक पूर्व ऊंचे पर्वतों और पहाड़ियों पर घने जंगल होते थे परन्तु अब ये तीव्र गति से क्षीण होते जा रहे हैं। इन्हीं कारणों से मैंने स्वयं देखा है, कई स्थानों पर चश्में तथा छोटे-छोटे  नदी और नद अदृश्य होते जा रहे हैं। फलस्वरूप, मानव तथा वन-प्राणियों के बीच पानी और अन्न के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

बहुत से किसान बंदरों को नपुंसक बनाने की औषधि के उपयोग की वकालत कर रहे हैं तो कई और भी हैं जो इन्हें गोली से उड़ाने की अतिवादी आज्ञा मांगते हैं । 
कृषि विभाग तथा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सुझाव देते हैं कि किसान भाई-बहन पर्यायी फसलें जैसे अदरक, हल्दी, थोम, भिंडी, गेंदा के फूल जैसी तथा औषधीय और सुगन्धित फसलें उगाएं जो बंदरों को आकृष्ट नहीं करतीं । कृषि विभाग  इस सम्बन्ध में प्रचार - प्रसार भी कर रहा है परन्तु इन सब के लिए समुचित बीज, प्रसंस्करण और बाज़ार की सुविधाएं भी तो प्रदान करनी होंगी ।

वन विभाग और भू-संरक्षण विभाग परंपरागत जल-स्रोतों के जीर्णोद्धार और पानी को रोकने तथा संचय करने के लिए नए तालाब तथा बांधों के निर्माण की बात कर रहे हैं जिससे चश्मों में दुबारा पानी बहने लगेगा। सामाजिक वानिकी विभाग अनुपयोगी पड़े हुए क्षेत्रों तथा क्षीण हुए जंगलों को पुनर्जीवित करने के प्रयास में संलग्न है।   

स्वाभाविक है कि मानव द्वारा आमंत्रित इस आतंक से छुटकारा पाने का एक-मात्र उपाय  भी वन तथा वन्य-प्राणी विभाग, कृषि विभाग, बागबानी विभाग, शहरी तथा ग्राम विकास विभाग तथा सामान्य जनता द्वारा परस्पर सहयोग से और सूझ बूझ के आधार पर तैयार किये जाने वाली कार्य-योजना से ही संभव है। ज़मीनी स्तर पर काम काज की गुणवत्ता को पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष परिणाम दिलाने वाली रणनीति से ही लागू  करना होगा। स्थानीय जंगली फल उत्पादक वृक्ष जो पशुओं को उनकी खुराक उपलब्ध करा सकें जंगलों में व्यापक तौर पर लगाए जाने चाहियें। स्थानीय पेड़ जैसे  शीशम, पीपल, बरगद, इत्यादि जो दीर्घजीवी परन्तु लुप्तप्राय होते जा रहे हैं, उन्हें बढ़-चढ़ कर लगाया जाना चाहिए। जल संरक्षण के प्रयास  तेज़ होने चाहियें। 
(शेष फिर।  शारदा लाल, भदरवाह )

  
 
 
 
 
 

 


बुधवार, 20 मार्च 2019

होली आई, होली आई

होली आई, होली आई
इस फाल्गुन फिर होली आई,
बरसों बीते निर्जन-मन में
प्रेम झड़ी फिर होली लाई ।।

होली आई, होली आई

इंद्रधनुष लाया आकाश
कभी सघन घन, कभी प्रकाश,
धरा पे महके तरुवर फूल
प्रेम सुधा संग होली आई।

होली आई, होली आई

बच्चों ने हुड़दंग मचाया,
बछड़ों ने भी खूब छकाया,
कुदरत रही है झूला झूल,
रंगों के संग होली आई।

होली आई, होली आई

विद्यालय में छुट्टी है,
फिर भी कहीं न सुस्ती है।
गाँव-शहर में जमा है रंग,
उत्साह के संग होली आई।

होली आई, होली आई

मुश्किल से अवकाश मिला है,
देखो तो, क्या रूप खिला है,
राखो प्रभु जी जन की टेक
होला के संग होली आई।

होली आई, होली आई

रंग भरो, मारो पिचकारी ,
गुस्सा छोडो, दो किलकारी,
निर्बल को बाहों से उठाओ
साहस के संग होली आई।

होली आई, होली आई

हंसी-ख़ुशी से काम चलाओ,
रंग-रंग बिखराते जाओ,
बैर-द्वेष हो बीती बात,
शुचिता संग होली आई।

होली आई, होली आई

(सी.एम. शर्मा )

 
 
 नैसर्गिक होली


रंगों के प्रेमी,
जहाँ हो - जैसे भी हो,
छोड़-छाड़ कर गाउँ - शहर
सब दौड़े आओ।
जितने भी हैं रंग धरा पर
और गगन में,
आँखों से चुन लो
ह्रदय में भरते जाओ।।

यह  देखो
सरसों के पीले खेत खिले हैं,
श्याम-हरित भू-भाग
नदी-नालों से सिले हैं।
आसमान भी खुश है,
धरती नहा रही है,
धूप बादलों के पीछे से
झाँक रही है।।

छन कर आती
देवदार के झुरमुट में से,
सूरज की किरणें है -
रंग गुलाबी जिनका।
ताक-झाँक कर रिम-झिम
बूंदों के संग गा कर,
अभिनन्दन करतीं हैं -
वे भी नव पल्लव-फूलों का।।

इधर देख लो
खुशियों के शृंगार पर्व पर,
धरती-अम्बर पर भँवरे -
गुञ्जार रहे हैं।
रंग-बिरंगी
पावन होली के अवसर पर
देते हैं सन्देश
विविधता में उत्सव का।।

आज प्रफुल्लित ह्रदय का
सबको खुला निमंत्रण,
नैसर्गिक पर्वत श्रेणी में
दौड़े आओ।
रंग यहीं हैं, काव्य यहीं है,
प्रीत यहीं है,
तन-मन से स्वागत है
होली के दिन सबका।।

(सी.एम. शर्मा )



 

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

aazaadii

आज़ादी 

माना अब आज़ाद हैं हम, आज़ादी हमको प्यारी है,
जल, थल और आकाश में उड़ने की अभिलाषा न्यारी है।

सुन्दर घर है हम सब का, चाहे कुटिया, महल, अटारी है,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर पर श्रद्धा सबकी सारी है।

लेकिन फिर भी कोई मनचला ठेस हमें पहुंचाता है,
प्रेम और विश्वास के आँगन में हड़कंप मचाता है।

विचलित होकर धैर्य सिहरता, जग जाता मन में अज्ञान,
अगले पल सुमिरन हो आता "स्वत्व, आस्था और स्वाभिमान।"

दिल में जागृत हो जाती है मानवता की शाश्वत रीत,,
कैसे भूलें हदों की रक्षा, जब हम बाँटें घर-घर में प्रीत।

अपनी फुलवारी को काँटों के ज़ख्मों से बचाना है,
निर्बल को दे अभय-दान, निज घर को स्वर्ग बनाना है।

याद रखो है नींव देश की आदर, श्रद्धा और सम्मान,
चार-दीवारी है निष्ठा की, आस्था का है यह निर्माण।

बल-पौरुष, शिक्षा की छत से रखें सुरक्षित घर परिवार,
हिल-मिल कर जीने-मरने का कायम रहे सुहृद व्यवहार।

सुखी और संपन्न हो जन-जन, सफर नहीं है यह आसान,
नमन हमारा उनको जो तन, मन, धन का करते बलिदान।।

शारदा लाल (२६-०२-२००७)






 

रविवार, 11 नवंबर 2018

माँ के बेटे

माँ के बेटे

वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।
मिटा कर अपनी हस्ती को वतन की शान बढ़ाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमारे कल की चिंता उनके दिल की धड़कनों में है,
वतन के माँ, बहिन, बेटी की रक्षा उनका जीवन है।
इसी के वास्ते वे मौत से लड़ने को जाते हैं,
समर्पण अपना जीवन कर हमें जीवन दिलाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमें दे जीत का उपहार सेना कर रही उपकार,
अपना फ़र्ज़ हम समझें करें दृढ देश का आधार।
मेहनत हो कड़ी खेतों, स्कूलों, कारखानों में,
बढ़ा दें चौकसी सीमा के अंदर और सरहद पे ।।
सिपाही की विरासत की सुरक्षा, मान हो निश्चित,
तभी ज़िंदा रहेगा हिन्द, ज़िंदा हर जवान होगा।
इसी के वास्ते रणबांकुरे सम्मान पाते हैं,
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।   

गुरुवार, 16 अगस्त 2018


 
अटल सन्देश - अटल जी के नाम 
 
ऐ गीतकारयुग शिल्पकार ! अब गीत सृजन के नए बुनो तुम,
मानव का कवि-मन जागे, मानवता का गुण-गान करो तुम।
द्वार दिलों के वे खोलो जो घृणा-द्वेष को मिटा सकें,
वे छंद लिखो जो मानवता की मर्यादा का मान रख सकें। 
रीत प्रीत की, गूँज गीत की, अस्त्र-शस्त्र ,से ताकतवर है,
बंटवारे की सीमा तोड़ें, ह्रदय के उद्गारों में बल है।
गीत दिलों को जोड़ लेते हैं, गीत ह्रदय के भ्रमर का गुंजन,
गीत ह्रदय से जो उपजें, वे गीत ऊसर को करते मधुबन 
गीत होंठ पर जब है आते, कहाँ छिपे रहते फिर राज़,
पत्थर जैसे भारी दिल भी, लेते हैं लम्बी परवाज़।
फ़ख़र नहीं है किसे इस दिल पर, निज दिल पर न किसे है नाज़,
ये सब हैं दिल की बातें और हर एक दिल में कई महाज़।
दिल में जंग के बादल भी हैं, प्यार के सागर भी हैं दिल में,
तोड़ें जो दीवारें दिल की, रस के भरे गीत दिल में हैं।
फ़ख़र हमें इन गीतों पर है, गीतों की भावुकता पर है,
जिस संस्कृति में संत रमे हैं, उनके वचनों-कर्मों पर है। 
नानक, गौतम संत यहां हैं, वाल्मीकि, चैतन्य, जनक, हैं,
मीरा औ' रहीम तुल्य भी, "मदर  टेरेसा जैसे धनक हैं।
कर्म हमारी रग-रग में है, कृष्ण हमारे गीतों में हैं,
राम प्रेरणा स्रोत हमारे, शिव-शंकर हर कण-कण में हैं। 
 
त्याग भावना ने हम सब को, सहन-शक्तियुत सबल किया है,
प्रेम और सद्भाव की खातिर खून का हमने दान दिया है।
फिर भी यदा - कदा कैकेई की मति नियति ने फेरी है,
उसे पता क्या राम - भारत के बीच नहीं कोई दूरी है!
जुदा हुए परिवार तो क्या, अब भी संधि का मौका है,
जो हैं भटके और क्षुब्ध हुए हैं, मिलें तो फिर किसने रोका है?
छोड़ चुके जो हाथ मिलाना द्वेष छोड़ वे होश में आएं,
मानवता की खुली डगर पर प्रेम के जग-मग दीप जलाएं।
आज  मिलन की  बेला है, अब मन-तरंग का ज़ोर दिखाओ,
ऐ कविमन नेतृत्व दिखाओ, "खून से बिछड़ा खून मिलाओ!
खून से बिछड़ा खून मिलाओ!! खून से बिछड़ा खून मिलाओ!!
 _____(शारदा लाल, भद्रवाह। यह कविता मैंने तब लिखी जब अटल बिहारी वाजपेयी जी मित्रता का हाथ बढ़ाने भारत के प्रधान मंत्री के रूप में पकिस्तान के लाहौर शहर पहुंचे थे। हमें अभी भी यह आशा है कि वाजपेयी जी का यह मिशन, जो सभी सकारात्मक सोच रखने वाले भारतीयों और पाकिस्तानियों का प्रतिनिधित्व करता है शीघ्र ही सफल होगा । हमारी अंतरआत्मा से वाजपेयी जी और उनकी सोच को श्रद्धापूर्वक नमन!)
 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

स्वतंत्रता दिवस पर स्वतंत्रता आंदोलन के कारकों को भी याद करें

(शारदा लाल, भद्रवाह )

यह कैसी विडंबना है कि जो उद्देश्य और प्रेरणा स्रोत भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कारक बने, स्वतंत्र भारत के बहुत से नागरिक आज उन्हें तुच्छ समझने लगे हैं।  मंगल पांडे और उनके सहयोगियों ने अपने जीवन की आहुति इस लिए दी की उन्हें अंग्रेजी कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी का शक था। अपनी संस्कृति और धर्म को बरक़रार रखने के लिए उन्होंने ऐसे कारतूस को मुंह लगाने के बदले अपने प्राण न्योछावर कर देना श्रेयस्कर समझा ।

भारत एक सेक्युलर (धर्मनिरपेक्ष) देश है। इसका अर्थ यह नहीं की यहां के नागरिक धर्म को नहीं मानते। वास्तविक बात तो यह है कि यहां की जनता धार्मिक प्रवृति की है। धार्मिक होना अच्छी बात है परन्तु साथ में यह भी ध्यान रखने की बात है कि सभी लोग एक-दुसरे की धार्मिक भावनाओं का आदर करना अपना कर्त्तव्य समझें। सेकुलरिज्म का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक स्वयं धार्मिक होते हुए कोई ऐसी बात या ऐसा काम न करे जिससे दूसरे की धार्मिक भावनायें आहत हों । जिस गाय को एक व्यक्ति माता कहता है उसका यदि कोई वध करे तो ऐसी व्यवस्था से गौमाता कहने वाले का निराश होना स्वाभाविक है। भारतीय संविधान के निर्देशक सिद्धांतों में गौहत्या बंद करने की ओर कदम उठाना निहित है। तो फिर इसे यथा-शीघ्र बंद कर ही देना उचित है। लेकिन इस काम में सभी सरकारों  को समझदारी से यथाशीघ्र कदम उठाने चाहियें। सरकारों द्वारा बहस में उलझने के बदले हर तरह की हिंसा रोकने के लिए कारगर कदम उठाने चाहियें।

दूसरी ओर क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए की शहीद अशफाकुल्लाह खान, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, शहीद हवलदार अब्दुल हमीद, आज़ाद हिन्द फ़ौज के कप्तान शाहनवाज़ खान, सुप्रसिद्ध गायक मोहम्मद रफ़ी, उस्ताद बिस्मिल्लाह खान, अभिनेता दलीप कुमार और असंख्य मुस्लिम समुदाय के व्यक्तित्व भारत के लिए बेजोड़ काम करते गए और इसे समृद्ध बनाते गए। भारतवर्ष तभी एक सशक्त एवं समृद्ध राज्य बन सकता है जब हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, पारसी, बौद्ध, इत्यादि अपने धर्म, त्यौहार ख़ुशी से मना सकें, हिंसा - घृणा का त्याग करें, विकास के प्रयास करें और विकास के लाभ का मिल बाँट कर उपभोग करें।

यह भारत देश ही है जहाँ की सम्पन्नता की बातें सुन कर विदेशों लोग किसी न किसी कारण से यहां आते रहे हैं। अमेरिका की खोज तो कोलंबस ने सन्न १४९२ में आज से केवल ५२५ वर्ष पूर्व ही की थी परन्तु भारत में आने वाले विदेशी हज़ारों वर्षों से कभी तो आक्रामक बन कर आये, कभी शरणार्थी, कभी ज्ञान वर्धन के लिए और कभी व्यापारी बनकर।

कहा तो यह भी जाता है कि आर्य लोग भारत में आज से लगभग ३५०० वर्ष पूर्व आये जो की अभी विवादास्पद है। ग्रीस के शासक सिकंदर महान और सेलुकस निकाटोर (ईसा से ३२६ से ३२४ वर्ष पूर्व),  इतिहासकार मैगेस्थनीज़ ( ३०२ से २९८ वर्ष पूर्व ), कुषाण, इत्यादि (ईसा से २०० वर्ष पूर्व से लेकर सन्न ३०० ईस्वी तक), हुन पांचवीं और छठी शताब्दी के बीच आक्रमण करते रहे और यहां की संस्कृति में ढलते गए। फ हैं (३९९ से ४१२ ईस्वी), हिउएन तसंग (६२९ से ६४५ ईस्वी), अल बेरुनी (१००० से १०२५ ईस्वी), मार्को-पोलो (१२५४ से १३२४ ईस्वी) ज्ञान वर्धन एवं सैलानी के रूप में भारत आये। अरब से मोहम्मद बिन क़ासिम ने ७१२ ईस्वी में सिंध पर आक्रमण किया। मोहम्मद ग़ज़नी ने १००० ईस्वी में आकर लूट--पाट की और वापिस चले गया। यह मोहम्मद गौरी था जिसने ११९४ ईस्वी में आक्रमण के बाद दिल्ली पर कब्ज़ा जमाया। उसने भारत की संस्कृति पर इस्लामिक संस्कृति का सिक्का जमाना शुरू किया जो तैमूर (१३९८ ईस्वी) के आक्रमण और फिर मुग़ल साम्राज्य की १५२६ ईस्वी में स्थापना के पश्चात बढ़ता ही गया। नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली का क्रूर आक्रमण १७३९ से १७६७ ईस्वी के बीच भारत पर हुआ जिसमे कई लोग मारे गए और सम्पति को भारी नुक्सान हुआ।

पुर्तगाल से अल्फोंसो दे अल्बुकर ने गोवा पर १५१० ईस्वी में अपना अधिपत्य जमाया। इस बीच फ्रेंच, डच, डेन भी आये जिनका मक़सद मुख्यता व्यापार था। वर्ष १७५७ के उपरांत अँगरेज़ ईस्ट इंडिया कंपनी की शकल में और फिर ब्रिटिश साम्राज्य की शकल में पूरे भारतवर्ष पर पहले तो व्यापार के लिए और फिर शासन (कु :शासन ) के लिए स्थापित हो गए। अशोक चौरे (२०१७) के एक सादा और न्यूनतम अनुमान के अनुसार लगभग दो शताब्दी के अपने शासनकाल में अंग्रेज़ों ने भारत से ६०० ट्रिलियन पौंड की लूट और चोरी की जिसे भारत को लौटाया जाना चाहिए। कांग्रेस के प्रथम अध्यक्ष दादाभाई नौरोजी ने १८७० के दशक में लिखी हुई अपनी पुस्तक "पावर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया" में सन्न १८५७ उपरांत के अनुमान से प्रति वर्ष ४ मिलियन पौंड की लूट बताई थी। इस समय से पूर्व की लूट २ मिलियन पौंड प्रति वर्ष आंकी गई है और इसमें ७.५ प्रतिशत कम्पौंड इंटरेस्ट भी शामिल किया गया है।


अँगरेज़ पहले तो देश के मुस्लिम नवाबों और शासकों के विरुद्ध लड़ते रहे और फिर पैंतरा बदल कर हिन्दू शासकों के विरुद्ध दमनकारी चालें चलते रहे। अंत में उन्होंने दोनों पक्षों को आपस में लड़ने के लिए असहिष्णुता और अनादर का तरीका निकाला और भारतवर्ष को १४/१५ अगस्त १९४७ के दिन आज़ादी देकर दो देशों हिंदुस्तान और पाकिस्तान में बाँट दिया। १९७१ में पश्चिमी पाकिस्तान के नेताओं की लगातार बढ़ती हुई हठधर्मी के कारण पाकिस्तान भी टूटा और बांग्लादेश बना। अभी भी अंग्रेज़ों ने अपने सामरिक और व्यापारिक अधिपत्य को बनाये रखने के लिए इस उप-महाद्वीप में "फुट डालो और राज्य करो" की नीति नहीं छोड़ी है।

भारत का संविधान जो कि शक्ति और हिम्मत, शांति और सत्य, निरंतर विकास, समानता, धर्म के आदर और समरसता का वाहक है और सामाजिक न्याय का प्रतीक है, उसे सच्ची निष्ठा से लागू करने से ही निर्धन, शोषित, दलित, और कमज़ोर वर्ग का कल्याण हो सकता है। संपन्न वर्ग को स्वेच्छा से कुछ त्याग के लिए भी तैयार रहना चाहिए। तर्कसंगत टेक्स प्रणाली, आरक्षण सुविधा और प्रत्येक मनुष्य के जान-माल और सम्मान की सुरक्षा कानूनी और सामाजिक तौर पर इस तरह से सुनिश्चित होनी चाहिए कि वह भारतीयता में स्वयं को पूरी तरह भागीदार समझे, भारतीयता में अपनी सुरक्षा समझे और भारत के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने के लिए तैयार रहे। इस मार्ग में सरकार का दायित्व बहुत बड़ा है। कानून का राज्य स्थापित करना आवश्यक है। चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और खर्चे पर अंकुश, करप्शन को हटाना, ग्रामीण विकास और निराश्रितों को आश्रय देना स्वतंत्र भारत की अभी भी बहुत बड़ी चुनौती है। कानून का उल्लंघन करने वालों को समझा-बुझा कर और दंड दे कर क़ानून के दायरे में लाना होगा और पालन करने वाले को मान-सम्मान देना होगा। राजनीतिज्ञों और सरकारी अफसरशाहों का इस ओर उन्मुखीकरण परम आवश्यक है तभी भारत में सुराज और सुशासन स्थापित होगा।

 

शनिवार, 28 जुलाई 2018

अब आवश्यक है मृदा स्वास्थ्य कार्ड आधारित  सिफारिशों पर उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का फसलों में उपयोग करना  

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के नेशनल मिशन ऑन सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (नमसा) के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण और  अत्यंत महत्त्वाकांक्षी योजना है। इस योजना का शुभारंभ १७ फरवरी २०१५ को माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने राजस्थान के सूरतगढ़ में किया। श्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि अगर किसान इसे अपना लेते हैं तो प्रति तीन एकड़ में कम से कम ५० हजार रूपये  बचा सकते हैं। खेती बाड़ी का तरीका मृदा की गुणवत्ता पर निर्भर होना चाहिए।

इस योजना के अंतर्गत किसानों को उनके खेतों में बोई जाने वाली फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और उर्वरकों को उपयोग करने की सलाह प्रयोगशाला में मिटटी के नमूने की जाँच के आधार पर प्राप्त नतीजे के मुताबिक ही दी जाती है, ताकि किसान अच्छी पैदावार का लाभ उठा सकें।

कृषि विभाग के अधिकारी एवं प्रचार - प्रसार कार्यकर्ता पिछले ४ वर्षों से इस विषय में किसानों को जाग्रत करते रहे हैं।  अपने निजी एंड्राइड मोबाइल फोन की सहायता से उन्होंने खेतों की मिटटी के उपयुक्त नमूने अक्षांश और लोंगिट्ठे ढूंढ कर इकठा किये हैं और विश्लेषण के लिए प्रयोगशाला में भी दिए। वैज्ञानिक ढंग से लाखों की संख्या में अन्य प्रांतों की तरह जम्मू कश्मीर राज्य में भी इन मिटटी के नमूनों का विश्लेषण हुआ। योजना के दिशा निर्देश अनुसार लगभग १० गुना की संख्या में किसान परिवारों के बीच इन  नतीजों  का ब्यौरा मृदा स्वास्थ्य कार्ड (साइल हेल्थ कार्ड्स) में दर्ज किया गया और फिर इन साइल हेल्थ कार्ड्स का वितरण भी हुआ।

विश्लेषण के द्वारा मिटटी में मौजूद पोषक तत्वों की मात्रा  और बोई या रोपी जाने वाली फसल में कितनी खाद और पोषक तत्वों का उपयोग करना है इसका पता भी चल जाता है ।  किसानों को खेत की मिट्टी की प्रकृति की जानकारी भी मिलती है।

पहले तो सरकार का लक्ष्य सभी किसान परिवारों को ३ वर्षों में कवर करने का था परन्तु फिर इसे घटा कर २ वर्ष ही कर दिया गया।  इस तरह से मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना  का पहला चक्र २०१६--१७ में पूरा हुआ और अब दूसरा शुरू हो गया है।  आशा तो बंधी है की सरकार के प्रयासों से और कृषि विषेशज्ञों के योगदान  से किसानों को मिट्टी की गुणवत्ता का अध्ययन करके एक अच्छी फसल प्राप्त करने में सहायता मिलेगी।

इस योजना के अंतर्गत सरकार का प्रति २ साल के अन्दर पूरे भारत में लगभग 14 करोड़ किसानों को यह कार्ड जारी करने का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्ड में एक विवरण छपता है जो किसानों को अपने खेत या जमीन के लिए २ साल में एक बार दिया जाना चाहिए । इस योजना के अंतर्गत मोबाइल मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएंस्थापित करने के लिए रूपये आबंटित भी किये गये हैं, ताकि किसानों को सही परीक्षण की सुविधा मिल सके और खेतों में फसलें लहलहा सकें। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में किसी खेत विशेष की मृदा का ब्यौरा होता है कि कौन-कौन से पोषक तत्व कितनी मात्रा में हैं और उसमें बोई गई फसलों को किस मात्रा में कौन सा उर्वरक दिया जाना चाहिए।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के पहले दो वर्षीय चक्र (२०१५-१७) में ३१ मई २०१७  तक २.५३ करोड़ लक्षित नमूने एकत्र किये गये थे और २.२२ करोड़ (९३  प्रतिशत) नमूनों का परीक्षण किया गया था । लगभग १०.७४ करोड़ लाभार्थियों के लिये ये कार्ड भेजे गए थे और ०६.०३ करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत भी किये गए थे। 

दुसरे दो वर्षीय चक्र (२०१७-१९) के लक्ष्य २.४४ करोड़ एकत्रित मृदा स्वास्थ्य कार्ड में से १.३० करोड़ नमूनों का विश्लेषण किया जा चुका है ।  लगभग ४.२४ करोड़ लाभार्थियों में वितरण के लिये ये कार्ड भेजे गए हैं और लगभग ०३.९० करोड़ कार्ड सम्बंधित पोर्टल पर पंजीकृत कर दिए गए हैं।

इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद यह देखा गया है कि जिस अभिप्राय (मक़सद) से यह नई मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना लागू की गई है उसे वास्तविक रूप से प्राप्त करने  में (किसानों द्वारा अपने खेतों में उपयोग करने में) अभी बहुत समय लगेगा। अभी लगभग न के बराबर किसान लोग मृदा स्वास्थ्य कार्ड की सिफारिश के आधार पर अपनी फसलों में उर्वरकों और पोषक तत्वों का प्रयोग कर रहे हैं। अभी भी बहुत से किसान हैं जिनके कार्ड तो बने हुए हैं परन्तु उन्हें इनकी उपयोगिता , उत्पादकता और आर्थिक लाभ के बारे में विशेष जानकारी नहीं है। यदि है, तो भी इसे नज़र--अंदाज़ कर रहे हैं। कुछ ऐसे किसान भी हैं जिनके कार्ड बने भी हैं पर उन तक ये पहुंचे नहीं हैं और कुछ और किसान हैं जिनके साइल हेल्थ कार्ड अभी बने ही नहीं हैं।

मृदा परीक्षण कार्यक्रम कृषि विभाग की योजना में पहले भी शामिल था।  अब जो इस पर इतना बल दिया गया है तो इसके परिणाम साफ़ तौर पर नज़र आने चाहियें। किसानों को उर्वरक और पौध पोषक तत्वों का उपयोग इनकी सिफारिश के आधार पर ही करना चाहिए। सरकार द्वारा इस कार्यक्रम का मूल्यांकन करते रहना चाहिए, आवश्यक धन राशि का आबंटन समय पर करना चाहिए और इसे कार्यान्वयन में लाने के लिए पर्याप्त प्रदर्शन (डेमोंस्ट्रेशन प्लाट) किसान के खेत पर लगवाने चाहियें । सफल किसानों की कहानियां भी प्रसारित और प्रचारित की जानी चाहियें और परिणाम प्रत्यक्ष दिखाने चाहियें जिस से अन्य सभी किसान इस ओर प्रेरित हो सकें।

(सी.एम्.शर्मा)