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शुक्रवार, 27 मार्च 2020

जय माता की 

पूजा-पाठ और अध्य्यन का
यह अवसर है नवरात्रों में,
चलो सभी एकांत में बैठें
प्रभु से लौ लगाने में।

धर्म स्थलों  से दूर रहें हम
शुद्ध इन्हें भी रखना है,
मन मंदिर में ध्यान लगाएं
स्पर्श रोग से बचना है।

आज बड़ा संकट है छाया
मानवता पर, धरती पर,
घातक बन वाइरस आया
'कोविद उन्नीस' डर बन कर।

चीनी शहर 'वुहान' से उपजा,
आतंकित हैं सारा संसार,
अपनों से सब डरे हुए हैं
अपने से भी भय है आज।

ज़रा सा छू लेने से घातक
हो जाता यह वाइरस रोग,
साबुन से हाथों को धोवें
घरों में बैठें सारे  लोग।
 
मन-मंदिर में हम बैठे हैं
विनय यहीं से करते आज,
जय माता की, जय माता की,
जय करुणामयी, रखना लाज।

शारदा लाल, भद्रवाह

 

सोमवार, 27 जनवरी 2020

देश ने २६ जनवरी, २०२०, रविवार के दिन  भारत का ७१वां गणतंत्र दिवस मनाया।  शिशिर ऋतु की खुली मनमोहक धूप और तन को आनंदित करने वाली तपिश ने लगभग सभी को घर से बाहिर निकलने के लिए प्रेरित किया। बाहिर निकलने वालों में एक बार फिर सब से आगे-आगे थे जवान और किसान।

वैसे तो शायद ही कोई दिन होगा जब जवान और किसान घरों में बैठते हों। वे जानते हैं कि यदि वे घर में बैठे रहें तो सीमाओं पर घुसपैठ और सड़कों पर अराजकता कौन रोकेगा, मातृभूमि की संतान को अन्न उपलब्ध कौन कराएगा, कल-कारखानों के लिए कच्चा माल और न केवल मानव जाति अपितु पशु धन के लिए भी आहार कौन उपलब्ध कराएगा ! परन्तु आज वे भिन्न-भिन्न स्थानों पर पिछले कुछ माह की सर्दी, वर्षा और हिमपात के उपरान्त सुखद मौसम का आनंद लेने के साथ-साथ अपने कर्तव्य को निभाने सीमाओं और खेतों में डट गए थे।

यह देश का गणतंत्र ही है जो सभी नागरिकों को सुखी एवं सम्मानित जीवन जीने के अधिकार देता है।  यह गणतंत्र सरकार पर न्याय एवं विधान का सम्मान करने वाले प्रत्येक व्यक्ति की सुरक्षा निश्चित करने का दायित्व भी सौंपता है। यही गणतंत्र है जो प्रत्येक नागरिक पर देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को भी निश्चित करता है। यदि देश के नागरिक जिम्मेदारियें न निभाएं तो वे सुरक्षित कैसे रह पाएंगे। अराजकता किसी को लाभ नहीं सकती।

इस गणतंत्र की रक्षा के लिए असंख्य बाल, नवयुवक, वृद्ध स्त्री-पुरुषों ने स्वतंत्रता प्राप्ति से पहले और फिर उसके पश्चात आज-तक विभिन्न क्षेत्रों में कई प्रकार के बलिदान दिए हैं यहां तक कि प्राणों को भी न्योछावर कर दिया है।

कल जहाँ भी गया, मैंने जम्मु शहर में तो जनसमूहों द्वारा प्रत्येक चौराहे, गली, मोहल्ले, झुग्गी, भवन, दूकान, शॉपिंग माल, स्कूल, कॉलेज, इत्यादि स्थान पर तिरंगे झंडे को शान से फहराते हुए देखा परन्तु गाऊँ में भी उत्साह कम नहीं था। 

जम्मु शहर से कोई ६ किलोमीटर दूर पश्चिम में मुठी गाऊँ  में रहने वाले कुछ किसानी करने वाले लोग गाय बछड़े को धूप में रख कर सजावटी पौधों की खेती करके प्रसन्नचित होते हुए दिखे। वैसे तो अब यह गाऊँ भी पूरी तरह से शहर में परिवर्तित हो गया है परन्तु गाऊँ की विशेषताएं भी संजोए हुए है। प्रातः काल यहां के सरकारी हायर सेकेंडरी स्कूल में स्थानीय प्रिंसिपल ने कर्मचारियों तथा नागरिकों के समक्ष तिरंगा लहराया। वार्ड नंबर ६७ के पौर श्री सूरज प्रकाश पाधा ने रणबीर नहर के किनारे गणमान्य लोगों  की उपस्थिति में तिरंगा फहराया। श्री पाधा ने नागरिकों से स्वच्छता बनाए रखने में सहयोग का अनुरोध किया। 

मुठी  से कोई  ३ किलोमीटर दूर पश्चिम में वीरान पड़े हुए खेत दिखे जो या तो अधिक वर्षा के कारण बंजर पड़े थे या अब शहरीकरण की चपेट में आकर किसी नए निर्माण का इंतज़ार कर ररहे हैं। और आगे  २  किलोमीटर दूर पश्चिम में अकलपुर गाऊँ में गेहूं की फसल  सर्दी का प्रकोप सहने के पश्चात मुखर कर बाहिर आती हुई दिखती है।  मौसम अनुकूल होने पर इसमें निखार आने के आसार हैं। कुछ दूर और आगे जाकर  पता चलता  है कि  किसान कितना प्रगतिशील और निर्णय लेने  में समक्ष होता जा रहा है।  गेहूं जैसी परम्परागत फसल को छोड़ कर  बंद गोभी जैसी फसलों की खेती उसकी कृषि -शैली  का अंग  बन गई है।  पेड़ों के बीच में से छन कर निकलती हुई धूप ठण्ड से ठिठुरते प्राणी को रोमांचित भी करती है और उसमें नव चेतना और हर्सोल्लास की भावना का संचार करती है।

यही समय है जब पिछैती गेहूं की फसल में चौड़े पत्ते वाले खरपतवार की रोकथाम के लिए २,४, डी  इथाइल एस्टर का छिड़काव किया जाना चाहिए। त्रिलोक चंद जी जैसे कई किसान मैंने इस कार्य में संलग्न पाए और कुछ लोग फसल में यूरिया उर्वरक भी छिटक कर उपयोग रहे थे।

थोड़ी सी दूरी पर आगे जा कर गेंदा फूलों की खेती देख कर मन और अधिक आनंदीत हुआ । कृषि प्रणाली में विविधीकरण कृषक की आय में बढ़ोतरी का उत्तम उपाय है, परन्तु कृषक की चाहिए कि वे संगठन के रूप में कार्य करें जिससे उन्हें बीज, खाद, दवाइयें इत्यादि सुलभ हों और प्रसंस्करण तथा विपणन (मार्केटिंग) में भी सुगमता हो।  किसान भाई समझ लें कि प्रत्येक क्रिया में प्रत्येक स्तर पर शक्ति तो संगठन  में ही है । हाँ, यह अवश्य है कि प्रत्येक क्रिया सकारात्मक ही होनी चाहिए।

वहीँ गाऊँ में आगे गुज्जर लोग कुल्ले बनाकर अपनी भैंस-गाय पालते हुए जीवनयापन करते हुए मिले। सभी लोगों का परस्पर सौहार्द देश को सशक्त करता है। स्वाभाविक है कि इन लोगों में  भी अपनी जीवन शैली में सुधार लाने की प्रबल इच्छा है। सरकार को चाहिए कि इस समुदाय के लिए कोई ऐसी योजना बने जो इनके  परम्परागत पशुपालन के व्यवसाय को उन्नत, सरल और अधिक लाभप्रद बना सके।

अकलपुर से कुछ ही दूर और आगे सरोडा गाउँ में सड़क के किनारे सेवा-निवृत्त वीर सैनिकों को अपने बच्चों, पोते-पोतियों और स्थानीय लोगों के साथ  सेना के एक शहीद  स्मारक पर  भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित  करते हुए गौरवान्वित होते हुए देखा। मैं भी नतमस्तक हुए बिना कैसे रहता? इसी गाऊँ में युवा किसान कुलदीप सिंह अपनी माता के साथ कडम फसल की रोपाई कर रहे थे। यह  फसल विशेष प्रकार से कश्मीरी पंडितों की मन-भावन  शाक-भाजी है। इसमें विटामिन और अन्य पौष्टिक तत्व के साथ स्वाद भी उत्तम होता है और अब देश के अन्य भागों में भी प्रचलित हो गई है।  इसकी खेती किसान को कम लागत पर अधिक लाभ दे सकती है।

सरोड़ा से आगे घो - मनहासां की तरफ जाएं तो किसान अन्य फसलों जैसे तोरिअ, सरसों के साथ गन्ना भी उगाते हैं। कुछ प्रगतिशील किसान लीची की खेती कर रहे हैं और बीच में अंतरवर्तीय फसल जैसे गेहूं (दाने और चारे, दोनों के लिए) भी ले रहे हैं। प्रीतम सिंह जी सैनी जैसे किसान ब्रोक्कोली की खेती वृहद्द स्तर पर कर रहे हैं।  यह प्रणाली उन्हें समृद्ध भी बना रही है।

आगे देवीपुर और भगतपुर की ओर जाते हुए मुझे यह देख कर ठीक नहीं लगा कि एक तो गेहूं जैसी फसल अधिक  वर्षा में जलभराव के कारण दबी सी रह  गई है वहीँ दूसरी ओर पॉलिथीन शीट और कचरा पानी संग ऊपर के इलाकों से बह कर निचले खेतों में एकत्रित हो गया है जो हानिकारक है।

भगतपुर चौक मेटाडोर स्टॉप के पास में पेड़ों के झुरमुट के नीचे साफ़-सुथरे टाइलों से सजे चौपाल को देख कर मन फिर से प्रफुल्लित हुआ। सन्देश मिला कि हमें प्रदूषण को रोकने के लिए व्यक्तिगत एवं सामूहिक स्तर पर सचेत होना चाहिए और इस स्थिति से उबरना चाहिए।

गणतंत्र दिवस की इस लघु यात्रा से मेरा यह विश्वास और दृढ हुआ है कि यद्यपि  देश की समृद्धि में एक-एक नागरिक का योगदान महत्त्व रखता है परन्तु सामूहिक तौर पर "जय जवान, जय किसान और जय विज्ञान" ही एक ऐसा मन्त्र है जो "जय हिन्द" के उद्घोष को चरितार्थ करता है !

सी.एम.शर्मा



 

शनिवार, 14 दिसंबर 2019


सोलकी--पंजाह सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत की आवश्यकता 

अभी २ दिन पूर्व मैं कालाकोट के पंजाह गाऊँ में अपने घनिष्ठ सम्बन्धी के अंतिम संस्कार में भाग लेने हेतु गया था। वर्षा छमाछम बरस रही थी। जम्मू से राजौरी-पूंछ मुख्य मार्ग की स्थिति देख कर अच्छा लगा, परन्तु सोल्की से पंजाह की ओर घूमते ही इस ग्रामीण सड़क की स्थिति देख कर अत्यंत दुःख हुआ। टूटी और गड्ढेदार सड़क, मुसलाधार बारिश, मेटाडोर में ओवरलोड छात्र, कर्मचारी और सामान्य जनता अपनी जान को जोखिम में डाल कर यात्रा करने को मजबूर हैं। ईश्वर न कर कहीं कोई दुर्घटना हो जाए तो कौन उत्तरदायी होगा ? आवश्यकता है इस सड़क की शीघ्रातिशीघ्र मरम्मत करने की। जनता वर्षों से सरकार की ओर देख रही है। अभी आशा तो बहुत है। उम्र - रसीदा लोग कहते हैं कि यदि अभी नहीं हुआ तो फिर न जाने उनके जीते जी होगा या नहीं।     


वानर सेना का  आतंक 

पंजाह गाऊँ  में  मेरी  नज़र चारों तरफ खेतों में धड़ल्ले से घूम रहे बन्दरों के टोलों पर पड़ी। ये बन्दर खेतों में बोए हुए गेहूं के बीज निकाल-निकाल कर खा रहे थे।  किसानों ने इस विषय में कई बार प्रशासन से शिकायत की है। कोई कारगर समाधान न मिलने पर खेत के खेत लोगों ने दुखी हो कर फसल से खाली  ऱखने शुरू कर दिए हैं।

वर्ष २०१५-१६ में प्राप्त एक अनुमान के अनुसार बन्दर जम्मू संभाग में कठुआ, साम्बा, उधमपुर, जम्मू, राजौरी, रिआसी, डोडा ज़िलों के २५० से अधिक गाऊँ में लगभग १५, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल पर मक्का, गेहूं, धान, फल और सब्ज़ी फसलों को अत्यधिक हानि पहुंचा रहे हैं। ४, ००० हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल में फसलें तो बोई ही नहीं जा रहीं। तब ३३ करोड़ रूपये से अधिक का आर्थिक नुक्सान आंका गया था ।

भूख के मारे हुए जंगली पशु फलदार फसलों जैसे आम, अमरुद, नाशपाती, अंगूर, नीम्बू जाति के वृक्षों, लीची, आड़ू, आलूबुखारा, और खुबानी के अंतर्गत लगभग ६८,३८४ हेक्टेयर क्षेत्र में व्यापक नुक्सान पहुंचा रहे हैं। पंजाह गाऊँ में जो तस्वीर मैंने देखी वह बताती है कि यह नुक्सान अब कई गुणा बढ़ा होगा।

बन्दर वन्य प्राणी है और इसका सरोकार बहुधा वनों तथा वन विभाग के अधिकारियों तथा विशेषज्ञों से है। इसका व्यवहार कृषि - किसानी और जम्मू जैसे मंदिरों वाले शहर में साधारण लोगों से जुड़ा हुआ है। निर्लज्ज और शरारती वानर खम्बों, तारों, गाड़ियों और घरों की छतों पर हुड़दंग मचाकर लोगों को भयभीत करते हैं। कृषि विभाग ने भी वानरों द्वारा कृषि में हो रही हानि का मुद्दा वन विभाग से उठाया है। परन्तु समाधान अभी तक नहीं मिल पाया है।

वास्तव में वानर सेना का आतंक वनों की घटती सघनता के कारण से है। वनों के बीच से गुज़रते चौड़े - चौड़े मार्ग, रेलवे पटरियों, बस्तियों, तथा कई प्रकार की कथित विकास परियोजनाओं ने इनके प्राकृतिक निवास स्थलों को  उजाड़ दिया  है। अँधा-धुंध कटते पेड़-पौधों को किसने नहीं देखा।  कुछ दशक पूर्व ऊंचे पर्वतों और पहाड़ियों पर घने जंगल होते थे परन्तु अब ये तीव्र गति से क्षीण होते जा रहे हैं। इन्हीं कारणों से मैंने स्वयं देखा है, कई स्थानों पर चश्में तथा छोटे-छोटे  नदी और नद अदृश्य होते जा रहे हैं। फलस्वरूप, मानव तथा वन-प्राणियों के बीच पानी और अन्न के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

बहुत से किसान बंदरों को नपुंसक बनाने की औषधि के उपयोग की वकालत कर रहे हैं तो कई और भी हैं जो इन्हें गोली से उड़ाने की अतिवादी आज्ञा मांगते हैं । 
कृषि विभाग तथा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक सुझाव देते हैं कि किसान भाई-बहन पर्यायी फसलें जैसे अदरक, हल्दी, थोम, भिंडी, गेंदा के फूल जैसी तथा औषधीय और सुगन्धित फसलें उगाएं जो बंदरों को आकृष्ट नहीं करतीं । कृषि विभाग  इस सम्बन्ध में प्रचार - प्रसार भी कर रहा है परन्तु इन सब के लिए समुचित बीज, प्रसंस्करण और बाज़ार की सुविधाएं भी तो प्रदान करनी होंगी ।

वन विभाग और भू-संरक्षण विभाग परंपरागत जल-स्रोतों के जीर्णोद्धार और पानी को रोकने तथा संचय करने के लिए नए तालाब तथा बांधों के निर्माण की बात कर रहे हैं जिससे चश्मों में दुबारा पानी बहने लगेगा। सामाजिक वानिकी विभाग अनुपयोगी पड़े हुए क्षेत्रों तथा क्षीण हुए जंगलों को पुनर्जीवित करने के प्रयास में संलग्न है।   

स्वाभाविक है कि मानव द्वारा आमंत्रित इस आतंक से छुटकारा पाने का एक-मात्र उपाय  भी वन तथा वन्य-प्राणी विभाग, कृषि विभाग, बागबानी विभाग, शहरी तथा ग्राम विकास विभाग तथा सामान्य जनता द्वारा परस्पर सहयोग से और सूझ बूझ के आधार पर तैयार किये जाने वाली कार्य-योजना से ही संभव है। ज़मीनी स्तर पर काम काज की गुणवत्ता को पारदर्शी एवं प्रत्यक्ष परिणाम दिलाने वाली रणनीति से ही लागू  करना होगा। स्थानीय जंगली फल उत्पादक वृक्ष जो पशुओं को उनकी खुराक उपलब्ध करा सकें जंगलों में व्यापक तौर पर लगाए जाने चाहियें। स्थानीय पेड़ जैसे  शीशम, पीपल, बरगद, इत्यादि जो दीर्घजीवी परन्तु लुप्तप्राय होते जा रहे हैं, उन्हें बढ़-चढ़ कर लगाया जाना चाहिए। जल संरक्षण के प्रयास  तेज़ होने चाहियें। 
(शेष फिर।  शारदा लाल, भदरवाह )

  
 
 
 
 
 

 


बुधवार, 20 मार्च 2019

होली आई, होली आई

होली आई, होली आई
इस फाल्गुन फिर होली आई,
बरसों बीते निर्जन-मन में
प्रेम झड़ी फिर होली लाई ।।

होली आई, होली आई

इंद्रधनुष लाया आकाश
कभी सघन घन, कभी प्रकाश,
धरा पे महके तरुवर फूल
प्रेम सुधा संग होली आई।

होली आई, होली आई

बच्चों ने हुड़दंग मचाया,
बछड़ों ने भी खूब छकाया,
कुदरत रही है झूला झूल,
रंगों के संग होली आई।

होली आई, होली आई

विद्यालय में छुट्टी है,
फिर भी कहीं न सुस्ती है।
गाँव-शहर में जमा है रंग,
उत्साह के संग होली आई।

होली आई, होली आई

मुश्किल से अवकाश मिला है,
देखो तो, क्या रूप खिला है,
राखो प्रभु जी जन की टेक
होला के संग होली आई।

होली आई, होली आई

रंग भरो, मारो पिचकारी ,
गुस्सा छोडो, दो किलकारी,
निर्बल को बाहों से उठाओ
साहस के संग होली आई।

होली आई, होली आई

हंसी-ख़ुशी से काम चलाओ,
रंग-रंग बिखराते जाओ,
बैर-द्वेष हो बीती बात,
शुचिता संग होली आई।

होली आई, होली आई

(सी.एम. शर्मा )

 
 
 नैसर्गिक होली


रंगों के प्रेमी,
जहाँ हो - जैसे भी हो,
छोड़-छाड़ कर गाउँ - शहर
सब दौड़े आओ।
जितने भी हैं रंग धरा पर
और गगन में,
आँखों से चुन लो
ह्रदय में भरते जाओ।।

यह  देखो
सरसों के पीले खेत खिले हैं,
श्याम-हरित भू-भाग
नदी-नालों से सिले हैं।
आसमान भी खुश है,
धरती नहा रही है,
धूप बादलों के पीछे से
झाँक रही है।।

छन कर आती
देवदार के झुरमुट में से,
सूरज की किरणें है -
रंग गुलाबी जिनका।
ताक-झाँक कर रिम-झिम
बूंदों के संग गा कर,
अभिनन्दन करतीं हैं -
वे भी नव पल्लव-फूलों का।।

इधर देख लो
खुशियों के शृंगार पर्व पर,
धरती-अम्बर पर भँवरे -
गुञ्जार रहे हैं।
रंग-बिरंगी
पावन होली के अवसर पर
देते हैं सन्देश
विविधता में उत्सव का।।

आज प्रफुल्लित ह्रदय का
सबको खुला निमंत्रण,
नैसर्गिक पर्वत श्रेणी में
दौड़े आओ।
रंग यहीं हैं, काव्य यहीं है,
प्रीत यहीं है,
तन-मन से स्वागत है
होली के दिन सबका।।

(सी.एम. शर्मा )



 

मंगलवार, 26 फ़रवरी 2019

aazaadii

आज़ादी 

माना अब आज़ाद हैं हम, आज़ादी हमको प्यारी है,
जल, थल और आकाश में उड़ने की अभिलाषा न्यारी है।

सुन्दर घर है हम सब का, चाहे कुटिया, महल, अटारी है,
मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर पर श्रद्धा सबकी सारी है।

लेकिन फिर भी कोई मनचला ठेस हमें पहुंचाता है,
प्रेम और विश्वास के आँगन में हड़कंप मचाता है।

विचलित होकर धैर्य सिहरता, जग जाता मन में अज्ञान,
अगले पल सुमिरन हो आता "स्वत्व, आस्था और स्वाभिमान।"

दिल में जागृत हो जाती है मानवता की शाश्वत रीत,,
कैसे भूलें हदों की रक्षा, जब हम बाँटें घर-घर में प्रीत।

अपनी फुलवारी को काँटों के ज़ख्मों से बचाना है,
निर्बल को दे अभय-दान, निज घर को स्वर्ग बनाना है।

याद रखो है नींव देश की आदर, श्रद्धा और सम्मान,
चार-दीवारी है निष्ठा की, आस्था का है यह निर्माण।

बल-पौरुष, शिक्षा की छत से रखें सुरक्षित घर परिवार,
हिल-मिल कर जीने-मरने का कायम रहे सुहृद व्यवहार।

सुखी और संपन्न हो जन-जन, सफर नहीं है यह आसान,
नमन हमारा उनको जो तन, मन, धन का करते बलिदान।।

शारदा लाल (२६-०२-२००७)






 

रविवार, 11 नवंबर 2018

माँ के बेटे

माँ के बेटे

वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।
मिटा कर अपनी हस्ती को वतन की शान बढ़ाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमारे कल की चिंता उनके दिल की धड़कनों में है,
वतन के माँ, बहिन, बेटी की रक्षा उनका जीवन है।
इसी के वास्ते वे मौत से लड़ने को जाते हैं,
समर्पण अपना जीवन कर हमें जीवन दिलाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।
 
हमें दे जीत का उपहार सेना कर रही उपकार,
अपना फ़र्ज़ हम समझें करें दृढ देश का आधार।
मेहनत हो कड़ी खेतों, स्कूलों, कारखानों में,
बढ़ा दें चौकसी सीमा के अंदर और सरहद पे ।।
सिपाही की विरासत की सुरक्षा, मान हो निश्चित,
तभी ज़िंदा रहेगा हिन्द, ज़िंदा हर जवान होगा।
इसी के वास्ते रणबांकुरे सम्मान पाते हैं,
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।।
वह देखो माँ के बेटे सरहदों पर जान लुटाते हैं।२।   

गुरुवार, 16 अगस्त 2018


 
अटल सन्देश - अटल जी के नाम 
 
ऐ गीतकारयुग शिल्पकार ! अब गीत सृजन के नए बुनो तुम,
मानव का कवि-मन जागे, मानवता का गुण-गान करो तुम।
द्वार दिलों के वे खोलो जो घृणा-द्वेष को मिटा सकें,
वे छंद लिखो जो मानवता की मर्यादा का मान रख सकें। 
रीत प्रीत की, गूँज गीत की, अस्त्र-शस्त्र ,से ताकतवर है,
बंटवारे की सीमा तोड़ें, ह्रदय के उद्गारों में बल है।
गीत दिलों को जोड़ लेते हैं, गीत ह्रदय के भ्रमर का गुंजन,
गीत ह्रदय से जो उपजें, वे गीत ऊसर को करते मधुबन 
गीत होंठ पर जब है आते, कहाँ छिपे रहते फिर राज़,
पत्थर जैसे भारी दिल भी, लेते हैं लम्बी परवाज़।
फ़ख़र नहीं है किसे इस दिल पर, निज दिल पर न किसे है नाज़,
ये सब हैं दिल की बातें और हर एक दिल में कई महाज़।
दिल में जंग के बादल भी हैं, प्यार के सागर भी हैं दिल में,
तोड़ें जो दीवारें दिल की, रस के भरे गीत दिल में हैं।
फ़ख़र हमें इन गीतों पर है, गीतों की भावुकता पर है,
जिस संस्कृति में संत रमे हैं, उनके वचनों-कर्मों पर है। 
नानक, गौतम संत यहां हैं, वाल्मीकि, चैतन्य, जनक, हैं,
मीरा औ' रहीम तुल्य भी, "मदर  टेरेसा जैसे धनक हैं।
कर्म हमारी रग-रग में है, कृष्ण हमारे गीतों में हैं,
राम प्रेरणा स्रोत हमारे, शिव-शंकर हर कण-कण में हैं। 
 
त्याग भावना ने हम सब को, सहन-शक्तियुत सबल किया है,
प्रेम और सद्भाव की खातिर खून का हमने दान दिया है।
फिर भी यदा - कदा कैकेई की मति नियति ने फेरी है,
उसे पता क्या राम - भारत के बीच नहीं कोई दूरी है!
जुदा हुए परिवार तो क्या, अब भी संधि का मौका है,
जो हैं भटके और क्षुब्ध हुए हैं, मिलें तो फिर किसने रोका है?
छोड़ चुके जो हाथ मिलाना द्वेष छोड़ वे होश में आएं,
मानवता की खुली डगर पर प्रेम के जग-मग दीप जलाएं।
आज  मिलन की  बेला है, अब मन-तरंग का ज़ोर दिखाओ,
ऐ कविमन नेतृत्व दिखाओ, "खून से बिछड़ा खून मिलाओ!
खून से बिछड़ा खून मिलाओ!! खून से बिछड़ा खून मिलाओ!!
 _____(शारदा लाल, भद्रवाह। यह कविता मैंने तब लिखी जब अटल बिहारी वाजपेयी जी मित्रता का हाथ बढ़ाने भारत के प्रधान मंत्री के रूप में पकिस्तान के लाहौर शहर पहुंचे थे। हमें अभी भी यह आशा है कि वाजपेयी जी का यह मिशन, जो सभी सकारात्मक सोच रखने वाले भारतीयों और पाकिस्तानियों का प्रतिनिधित्व करता है शीघ्र ही सफल होगा । हमारी अंतरआत्मा से वाजपेयी जी और उनकी सोच को श्रद्धापूर्वक नमन!)