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मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

नया संकल्प 

 

दुनिया वालों से कह दो कि  अब वे चले गए हैं दिन 

आते थे जब हमलावर और होता था चौहाण पतन। 

 

नहीं बनेंगे  सोने की चिड़िया , व्याध से लोहा लेना है ,

देश-द्रोही को दण्डित कर के माँ को गौरव देना है । 

 

स्वयं जियो और जीने दो के सिद्धांत को देंगे कभी जो ठेस,

उनको भूमण्डल में हमने  नहीं कहीं रखना है शेष। 

 

संसार से जाओ यह कह दो, "अभिमन्यु नहीं मरेगा अब,

एक-एक क्या, सात व्यूह हों जीत के ही दम लेगा अब। 

 

सोने की चिड़िया नहीं बनेंगे, बनेंगे मानवता की लाज,

मानव की हम मदद करेंगे दानव को चीरेंगे आज। 

कुछ सीखो 


केले के छिलके को भैया राहों में न फेंको,

इन पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो।

 

वहां के सारे लोग हंसेंगे, उसको देंगे ताना ,

चलने की  जो शिक्षा चाहिए, तुम फौजी बन जाना। 

 

बेचारा तो उठ न सकेगा, कहेगी पीड़ा "चीखो"

लोग वहाँ  पर यही कहेंगे "चलना तो भैया सीखो"

 

मुँह पीला करके हँस  देगा, उठेगा लाज के मारे,

कहेगा "तुम सब सच्चे हो, हैं सारे दोष हमारे"।

 

खून का घूँट पियेगा घायल, भावुक हो रोने को,

नहीं सहारा देगा कोई उसे खड़ा होने को। 

 

स्वयं पूछ लो ह्रदय से अपने, रहा है क्या कहने को,

मेरी तरह समझ लो तुम भी सभी को यह कहने को,

 

केले के छिलके को भैया राहों में न फेंको,

इस पर से कोई फिसलेगा उसको भी तो देखो"। 


सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

आह्वान

 

मानवता की हवा बहे,

ये बंटवारे सब ढह  जाएं,

नफरत की आंधी ठंडी हो,

आओ सब मिल कर यत्न  करें। 

 

हम सभ्य बनें, सब वीर बनें,

और लाज रखें मर्यादा की,

सूरज सा रूप खिले भारत का,

मानवता का जाप करें। 

 

हम सभी सत्य व्रत धारी हों,

सब  प्रेम के अडिग पुजारी हों,

अमृत की बरसात करें,

सौहार्द के सब जन अनुचर हों। 

 

सब खिलें यहाँ "मत" पंकज बन कर,

गुण - ग्राहक जग से आएं ,

हम सुख बांटें, हम खुशियाँ  दे दें,

ज्ञान क्षुधा अब तृप्त  करें। 

 

हम मूल मन्त्र प्रगति का धारें, 

मिल-जुल कर सहयोग करें,

सब कर्म-यज्ञ में शामिल हो कर,

देश की विपदा दूर करें। 







 

रविवार, 14 अक्टूबर 2012

मन पक्षी

मन पक्षी
जब से नीड़ के बाहर मैने पाँव रखा है,
पंखों को सपनों की बस्ती में दर -दर उड़ता पाया है। 
 चिर परिचित दिल की गर्मी का अनुभव पाने को ,
पक्षी घर से दूर चला है ,
दूर चला है। 
 
पानी की गिरती बूंदों की पार की दुनिया
मुझे भाई। 
यह क्षण -भंगुर सतरंगी भी
रिझा पाई। 
माटी की खुशबू  में लिपटी
मूरत मुझको रास  आई। 
सपनो से मन ऊब चुका है,
ऊब चुका है।
पक्षी घर से दूर चला है,
दूर चला है।  
 
खुशियों की सौगात
धुली है बरसातों में। 
होली आकर बीत गई है
सन्नाटों  में। 
दिवाली की रौनक,
नवरात्रों की पूजा,
नए वर्ष की खातिर ,
प्राणी भूल गया है। 
पक्षी घर से दूर चला है,
दूर चला है। 
 
आज है तुमसे
हे मन -पक्षी,
यही याचना। 
"उड़ने की पूरी ताकत दे ",
यही प्रार्थना। 
"सृष्टि  में जो विविधि ऋचाएँ
खूब गढी  है ,
अनुभूति -
संतोष सहित उनको पाने की
विधा बता दे,
पता बता दे,
दिशा बता दे। 
 
पक्षी घर से दूर चला है, दूर चला है। 
पक्षी घर से दूर चला है , दूर चला है। 
                                                                     (30-10-2006)

शनिवार, 6 अक्टूबर 2012

आनंद करो और राज्य करो

हम स्वस्थ बनें और श्रेष्ठ बनें ,
आदर्श बनें दुनिया के लिए।
आओ सब मिल संकल्प करें
कुछ त्याग करें दुनिया के लिए।

उत्तम है सबसे त्याग समय का
दींन -दुखी जनता के लिए,
हम खैर-ख़बर उनकी पूछें
कुछ वक़्त निकालें उनके लिए ।.

रोग ग्रस्त जो प्राणी हैं
निर्धन, बे-घर, अज्ञानी हैं,
आओ हम उनकी मदद करें
सम्भाव दिलों में उदीप्त करें।।

यह जीवन दर्द भरा है बहुत
इसमें सुख की इच्छा है प्रबल,
आओ सुख के पल-छिन  बाँटें
सम-भ्रात्र भाव से आगे बढ़ें।।

ये दया के सागर मंदिर-मस्जिद,
गुरूद्वारे और गिरीजाघर ,
अर्पित कर दें अपने संसाधन
संताप से जग को मुक्त करें।।

प्रभु ने बहुत दिया है हमें
हम दान करें निज सुख के लिए।
संतोष की धारा पीने को
हम प्रेम की गंगा बहाते रहें।।

बच्चो, तुम कल के शासक हो
संसार के भाग्य-विधाता हो।
संकल्प करो, नेकी पर चल कर---

( न्याय की खुली व्यवस्था में---)

आनंद करो और राज्य करो,
आनंद करो और राज्य करो।।
                          (15 अगस्त 2011)







रक्षा करो 

रक्षा करो, रक्षा करो।
रक्षा करो, रक्षा करो।
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

बख्शो मुझे, बख्शो मुझे।
बख्शो मुझे, बख्शो मुझे।
बख्शो दुर्व्यस्नों से बख्शो मुझे।

मेरा ह्रदय है अस्थिर बहुत,
न जाने कहाँ जाए दृष्टि बिखर।
मुझे डाल दो साधना की डगर।
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो;
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

स्वाधीन हो मेरे मन का भ्रमर,
कभी  घुट के तड़पे न परबस बन कर।
हनुमान भेजो, जला दो नगर,
गिरा दो ये ऊँचे अहम् के शिखर।
सिया-राम भक्ति का वरदान दो,
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो,
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।

यह जीवन न जाने कहाँ से चला,
न जाने कहाँ तक चला जाएगा।
मिले राह में कौन, बिछ्डेगा कौन,
कहाँ शब्द उभरेंगे, कब होगा मौन।
वरद हस्त से मेरी रक्षा करो,
रक्षा करो, रक्षा करो।।

रक्षा करो, रक्षा करो,
रघुपति मेरे राजाराम,
रक्षा करो।।
                                (20-10-2011)

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

नेकी

नेकी

नेकी कर कुएं में डाल
मेहनत कर,
न कर मलाल। 
सजग हमेशा सिरजन-हार,
दीनों का  करता  उद्धार। 
नेकी कर कुएं में डाल।। १। 


पत्थर, पानी  में है दिखता ,
भीतर, बाहर सदा है मिलता I
बच्चों में  फूलों सा खिलता ,
ग्रह-तारों का  पालन -हार।
नेकी कर कुएं में डाल।। २ । 
बहुत कठिन है
जहाँ में चलना।
फिर भी तू कोई ग़म न करना। 
फूलों सी मंज़िल पाने को ,
थाम लेना काँटों की धार।
नेकी कर कुएं में डाल।। ३।
 
अपनी धुन में चलते रहना,
तूफ़ानों से कभी न डरना।
मर्यादा का पालन करके ,
करना सदा सुखी संसार । 
नेकी कर कुएं में डाल II ४।

नेकी कर कुएं में डाल II  
करना सदा सुखी संसार।। ५।